शोक Poetry (page 113)

कुछ नहीं होता शब भर सोचों का सरमाया होता है

अज़रक़ अदीम

तारीक उजालों में बे-ख़्वाब नहीं रहना

अज़रा वहीद

जलती बुझती हुई आँखों में सितारे लिक्खे

अज़रा वहीद

कैसे कैसे स्वाँग रचाए हम ने दुनिया-दारी में

अज़रा नक़वी

सारे दुख सो जाएँगे लेकिन इक ऐसा ग़म भी है

अज़्म शाकरी

घर में चाँदी के कोई सोने के दर रख जाएगा

अज़्म शाकरी

दरिया पार उतरने वाले ये भी जान नहीं पाए

अज़्म बहज़ाद

बे-हद ग़म हैं जिन में अव्वल उम्र गुज़र जाने का ग़म

अज़्म बहज़ाद

तेरी यादें हैं जिन्हें दिल में बसा रक्खा है

अज़ीज़ुर्रहमान शहीद फ़तेहपुरी

ख़ुशी महसूस करता हूँ न ग़म महसूस करता हूँ

अज़ीज़ वारसी

ग़म-ए-उक़्बा ग़म-ए-दौराँ ग़म-ए-हस्ती की क़सम

अज़ीज़ वारसी

ये हम पर लुत्फ़ कैसा ये करम क्या

अज़ीज़ वारसी

सोज़िश-ए-ग़म के सिवा काहिश-ए-फ़ुर्क़त के सिवा

अज़ीज़ वारसी

ख़ुशी महसूस करता हूँ न ग़म महसूस करता हूँ

अज़ीज़ वारसी

दिल में हमारे अब कोई अरमाँ नहीं रहा

अज़ीज़ वारसी

ये ग़म नहीं कि मुझ को जागना पड़ा है उम्र भर

अज़ीज़ तमन्नाई

उठा के मेरे ज़ेहन से शबाब कोई ले गया

अज़ीज़ तमन्नाई

बढ़ने दे अभी कशमकश-ए-तार-ए-नफ़स और

अज़ीज़ तमन्नाई

रसूल-ए-काज़िब

अज़ीज़ क़ैसी

मैं!

अज़ीज़ क़ैसी

कंफ़ेशन

अज़ीज़ क़ैसी

अज़ल-अबद

अज़ीज़ क़ैसी

दिल-ख़स्तगाँ में दर्द का आज़र कोई तो आए

अज़ीज़ क़ैसी

आह-ए-बे-असर निकली नाला ना-रसा निकला

अज़ीज़ क़ैसी

मैं नींद के ऐवान में हैरान था कल शब

अज़ीज़ नबील

ख़याल-ओ-ख़्वाब का सारा धुआँ उतर चुका है

अज़ीज़ नबील

हयात-ओ-काएनात पर किताब लिख रहे थे हम

अज़ीज़ नबील

दश्त-ओ-सहरा में समुंदर में सफ़र है मेरा

अज़ीज़ नबील

आँखों के ग़म-कदों में उजाले हुए तो हैं

अज़ीज़ नबील

सोज़-ए-ग़म से अश्क का एक एक क़तरा जल गया

अज़ीज़ लखनवी

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