शोक Poetry (page 115)

हम से ज़ियादा कौन समझता है ग़म की गहराई को

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

मेरा भी हर अंग था बहरा उस का जिस्म भी गूँगा था

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

कुछ ज़िंदगी में इश्क़-ओ-वफ़ा का हुनर भी रख

अज़ीज़ अन्सारी

हम उस को भूल बैठे हैं अँधेरे हम पे तारी हैं

अज़ीज़ अन्सारी

ज़मीं की ख़ाक तो अफ़्लाक से ज़ियादा है

अज़ीम हैदर सय्यद

शहर गुम-सुम रास्ते सुनसान घर ख़ामोश हैं

अज़हर नक़वी

किनारों से जुदा होता नहीं तुग़्यानियों का दुख

अज़हर नक़वी

गिर्दाब-ए-रेग-ए-जान से मौज-ए-सराब तक

अज़हर नक़वी

चाक-ए-दामान-ए-क़बा दाग़-ए-जुनूँ-साज़ बहुत

अज़हर नक़वी

अफ़्सुर्दगी-ए-दर्द-ए-फ़राक़त है सहर तक

अज़हर नक़वी

मैं महल रेत के सहरा में बनाने बैठा

अज़हर नैयर

मैं अपने शहर में अपना ही चेहरा खो बैठा

अज़हर नैयर

इस को कोई ग़म नहीं है जिस का घर पत्थर का है

अज़हर नैयर

हरे दरख़्त का शाख़ों से रिश्ता टूट गया

अज़हर नैयर

दरीचे सो गए शब जागती है

अज़हर नैयर

तू भी वफ़ा के रूप में अब ढल के देख ले

अज़हर जावेद

ये बार-ए-ग़म भी उठाया नहीं बहुत दिन से

अज़हर इक़बाल

उदास उदास तबीअ'त जो थी बहलने लगी

अज़हर इनायती

ख़्वाबों का इंतिख़ाब बदलता दिखाई दे

अज़हर हाश्मी

गुज़रे हुए लम्हात को अब ढूँड रहा हूँ

अज़हर हाश्मी

गर इक़्तिदार-ए-सुकूँ इक़्तिदार-ए-वहशत है

अज़हर हाश्मी

तिरे ब'अद कोई भी ग़म असर नहीं कर सका

अज़हर फ़राग़

अपना जैसा भी हाल रक्खा है

अज़हर अदीब

वो शोख़ दिल-ओ-जाँ की तमन्ना तो न निकला

अज़ीम कुरेशी

इश्क़ अपना अजब तमाशा है

अज़ीम कुरेशी

बीच दिलों में उतरा तो है

अज़ीम कुरेशी

ये और बात है कि मदावा-ए-ग़म न था

अज़ीम मुर्तज़ा

वही यकसानियत-ए-शाम-ओ-सहर है कि जो थी

अज़ीम मुर्तज़ा

तेरा ख़याल भी है वज़-ए-ग़म का पास भी है

अज़ीम मुर्तज़ा

तिरा ख़याल भी है वज़-ए-ग़म का पास भी है

अज़ीम मुर्तज़ा

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