शोक Poetry (page 116)

महरूमी के दुख और तन्हाई के रंज उठाए

अज़ीम मुर्तज़ा

लाई न सबा बू-ए-चमन अब के बरस भी

अज़ीम मुर्तज़ा

ग़म का ये सलीक़ा भी रह गया है अब हम तक

अज़ीम मुर्तज़ा

फ़ित्ना-सामाँ ही नहीं फ़ित्ना-ए-सामाँ निकले

अज़ीम मुर्तज़ा

अफ़्साना-ए-हयात-ए-परेशाँ के साथ साथ

अज़ीम मुर्तज़ा

कभी नाकामियों का अपनी हम मातम नहीं करते

आज़ाद गुरदासपुरी

वक़्त का ये मोड़ कैसा है कि तुझ से मिल के भी

आज़ाद गुलाटी

उसे भी जाते हुए तुम ने मुझ से छीन लिया

आज़ाद गुलाटी

एक वो हैं कि जिन्हें अपनी ख़ुशी ले डूबी

आज़ाद गुलाटी

वो जो किसी का रूप धार कर आया था

आज़ाद गुलाटी

रौशनी फैली तो सब का रंग काला हो गया

आज़ाद गुलाटी

किस ने सदा दी कौन आया है

आज़ाद गुलाटी

जो ग़म में जलते रहे उम्र-भर दिया बन कर

आज़ाद गुलाटी

हमारी आँख में ठहरा हुआ समुंदर था

आज़ाद गुलाटी

गो मिरा साथ मिरी अपनी नज़र ने न दिया

आज़ाद गुलाटी

दिल ने खुलने की राह ले ली है

आयुष चराग़

शफ़क़ हूँ सूरज हूँ रौशनी हूँ

अय्यूब साबिर

मता-ए-फ़िक्र-ओ-नज़र रहा हूँ

अय्यूब साबिर

रहगुज़ारों में रौशनी के लिए

अय्यूब रूमानी

कुछ और हो भी तो राएगाँ है

अय्यूब ख़ावर

तिलिस्म-ए-इस्म-ए-मोहब्बत है दरपय-ए-दर-ए-दिल

अय्यूब ख़ावर

सफ़र में फ़ासलों के साथ बादबान खो दिया

अय्यूब ख़ावर

इस क़दर ग़म है कि इज़हार नहीं कर सकते

अय्यूब ख़ावर

हरीम-ए-हुस्न से आँखों के राब्ते रखना

अय्यूब ख़ावर

आँख की दहलीज़ से उतरा तो सहरा हो गया

अय्यूब ख़ावर

आ जाए न रात कश्तियों में

अय्यूब ख़ावर

यूँ भी मिली है मुझ को मिरे ज़ब्त-ए-ग़म की दाद

अयाज़ झाँसवी

दीवानगी ने ख़ूब करिश्मे दिखाए हैं

अयाज़ झाँसवी

ये बातों ही बातों में बातें बदलना

औरंगज़ेब

निहत्ते आदमी पे बढ़ के ख़ंजर तान लेती है

औरंगज़ेब

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