शोक Poetry (page 126)

क्यूँ किसी और को दुख दर्द सुनाऊँ अपने

अनवर मसूद

दरमियाँ गर न तिरा वादा-ए-फ़र्दा होता

अनवर मसूद

क़याम-गाह न कोई न कोई घर मेरा

अनवर जलालपुरी

मैं हर बे-जान हर्फ़-ओ-लफ़्ज़ को गोया बनाता हूँ

अनवर जलालपुरी

न मैं समझा न आप आए कहीं से

अनवर देहलवी

हो रहा है टुकड़े टुकड़े दिल मेरे ग़म-ख़्वार का

अनवर देहलवी

देखा जो मर्ग तो मरना ज़ियाँ न था

अनवर देहलवी

अब अपना हाल हम उन्हें तहरीर कर चुके

अनवर देहलवी

कब लज़्ज़तों ने ज़ेहन का पीछा नहीं किया

अनवर अंजुम

ये क़िस्सा-ए-ग़म-ए-दिल है तो बाँकपन से चले

अनवर मोअज़्ज़म

ये ग़ज़ल की अंजुमन है ज़रा एहतिमाम कर लो

अनवर मोअज़्ज़म

हमें भूला नहीं अफ़्साना दिल का

अनवर मोअज़्ज़म

ग़म-ए-हबीब ग़म-ए-दो-जहाँ नहीं होता

अनवर मोअज़्ज़म

दीदा-ए-तर ने अजब जल्वागरी देखी है

अनवर मोअज़्ज़म

क्या ख़बर थी कि तिरे साथ ये दुनिया होगी

अंजुम सिद्दीक़ी

बुझने दे सब दिए मुझे तन्हाई चाहिए

अंजुम सलीमी

नहीं नाम-ओ-निशाँ साए का लेकिन यार बैठे हैं

अंजुम रूमानी

हर चंद उन्हें अहद फ़रामोश न होगा

अंजुम रूमानी

दुखी दिलों के लिए ताज़ियाना रखता है

अंजुम रूमानी

अदू तो क्या ये फ़लक भी उसे सता न सका

अंजुम मानपुरी

पल भर उसे रुला कर देख

अंजुम लुधियानवी

ऐ शब-ए-ग़म जो हम भी घर जाएँ

अंजुम ख़याली

कितना ढूँडा उसे जब एक ग़ज़ल और कही

अंजुम ख़लीक़

याद है क़िस्सा-ए-ग़म का मुझे हर लफ़्ज़ अभी

अंजुम इरफ़ानी

बड़ी फ़र्ज़-आश्ना है सबा करे ख़ूब काम हिसाब का

अंजुम इरफ़ानी

और कुछ याद नहीं अब से न तब से पूछो

अंजुम इरफ़ानी

हम सब को बताते रहते हैं ये बात पुरानी काम की है

अंजुम बाराबंकवी

ना-उमीदी कुफ़्र है

अंजुम आज़मी

फ़रेब ग़म ही सही दिल ने आरज़ू कर ली

अंजुम आज़मी

एक सौदा है लज़्ज़त-ए-ग़म है

अंजुम आज़मी

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