शोक Poetry (page 124)

उन से इज़हार-ए-शिकायत करूँ या न करूँ

अर्श सहबाई

हज़ार हादसात-ए-ग़म रवाँ-दवाँ लिए हुए

अर्श सहबाई

मैं क्यूँ भूल जाऊँ

अर्श मलसियानी

जश्न-ए-आज़ादी

अर्श मलसियानी

15 अगस्त (1949)

अर्श मलसियानी

तरब के मख़मसे ग़म के झमेले

अर्श मलसियानी

इश्क़-ए-बुताँ का ले के सहारा कभी कभी

अर्श मलसियानी

दिल-ए-फ़सुर्दा पे सौ बार ताज़गी आई

अर्श मलसियानी

अगर तक़दीर तेरी बाइस-ए-आज़ार हो जाए

अर्श मलसियानी

ये शहर है वो शहर कि जिस में हैं बे-वज्ह कामयाब चेहरे

अर्जुमंद बानो अफ़्शाँ

हम हैं और ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ है आज-कल

अर्जुमंद बानो अफ़्शाँ

देख लो गे ख़ुद!

आरिफ़ा शहज़ाद

कैसा मातम कैसा रोना मिट्टी का

आरिफ़ शफ़ीक़

मैं अब उक्ता गया हूँ फुर्क़तों से

आरिफ़ इशतियाक़

गिला होंटों पे लाए जा रहा हूँ

आरिफ़ इशतियाक़

फ़सील-ए-ज़ात से बाहर भी देखना है मुझे

आरिफ़ इमाम

दास्ताँ भी मुख़्तलिफ़ लहजा भी यारों से जुदा

आरिफ़ अंसारी

रूह के जलते ख़राबे का मुदावा भी नहीं

आरिफ़ अब्दुल मतीन

मेरी सोच लरज़ उट्ठी है देख के प्यार का ये आलम

आरिफ़ अब्दुल मतीन

कितनी हसरत से तिरी आँख का बादल बरसा

आरिफ़ अब्दुल मतीन

जो उभरे वक़्त के साँचे में ढल के

आरिफ़ अब्दुल मतीन

छुपाए दिल में हम अक्सर तिरी तलब भी चले

आरिफ़ अब्दुल मतीन

'आरिफ़' अज़ल से तेरा अमल मोमिनाना था

आरिफ़ अब्दुल मतीन

मुझे महरूमियों का ग़म नहीं है

आरिफ़ अब्बास

या ख़ुदा कुछ तो दर्द कम कर दे

आराधना प्रसाद

बावरे मन की बावरी ख़ुशबू

आराधना प्रसाद

यूँ देखने में तो ऊपर से सख़्त हूँ शायद

अक़ील शादाब

मताअ-ओ-माल न दे दौलत-ए-तबाही दे

अक़ील शादाब

वो जानता है उस की दलीलों में दम नहीं

अक़ील नोमानी

हर इक रंज-ओ-ग़म से सुबुक-दोश हो जा

अक़ील नोमानी

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