शोक Poetry (page 122)

वअ'दा सच्चा है कि झूटा मुझे मालूम न था

आरज़ू लखनवी

क़ुर्बत बढ़ा बढ़ा कर बे-ख़ुद बना रहे हैं

आरज़ू लखनवी

न कोई जल्वती न कोई ख़ल्वती न कोई ख़ास था न कोई आम था

आरज़ू लखनवी

मुझ को दिल क़िस्मत ने उस को हुस्न-ए-ग़ारत-गर दिया

आरज़ू लखनवी

मीर-ए-महफ़िल न हुए गर्मी-ए-महफ़िल तो हुए

आरज़ू लखनवी

मिरे जोश-ए-ग़म की है अजब कहानी

आरज़ू लखनवी

किस मस्त अदा से आँख लड़ी मतवाला बना लहरा के गिरा

आरज़ू लखनवी

करम उन का ख़ुद है बढ़ कर मिरी हद्द-ए-इल्तिजा से

आरज़ू लखनवी

कहीं सर पटकते दीवाने कहीं पर झुलसते परवाने

आरज़ू लखनवी

हर साँस है इक नग़्मा हर नग़्मा है मस्ताना

आरज़ू लखनवी

गँवा के दिल सा गुहर दर्द-ए-सर ख़रीद लिया

आरज़ू लखनवी

अयाँ है बे-रुख़ी चितवन से और ग़ुस्सा निगाहों से

आरज़ू लखनवी

ऐ मिरे ज़ख़्म-ए-दिल-नवाज़ ग़म को ख़ुशी बनाए जा

आरज़ू लखनवी

ऐ जज़्ब-ए-मोहब्बत तू ही बता क्यूँकर न असर ले दिल ही तो है

आरज़ू लखनवी

हमारी महफ़िलों में बे-हिजाब आने से क्या होगा

अर्शी रामपुरी

यक़ीन-ए-सुब्ह-ए-चमन है कितना शुऊर-ए-अब्र-ए-बहार क्या है

अर्शी भोपाली

शौक़-ए-आवारा दश्त-ओ-दर से है

अर्शी भोपाली

ख़ुलूस-ए-अल्फ़ाज़ काम आया निगाह-ए-अहल-ए-फ़ितन से पहले

अर्शी भोपाली

फ़लसफ़ी किस लिए इल्ज़ाम-ए-फ़ना देता है

अर्शी भोपाली

दर्द के साँचे में ढल कर रह गई

अर्शी भोपाली

वीराँ वीराँ बाम-ओ-दर मैं और मिरी तन्हाई

अरशदुल क़ादरी

वो जिस ने मेरे दिल ओ जाँ में दर्द बोया है

अरशद सिद्दीक़ी

क़ल्ब-ओ-नज़र का सुकूँ और कहाँ दोस्तो

अरशद सिद्दीक़ी

मयख़ाने पे छाई है अफ़्सुर्दा-शबी कब से

अरशद सिद्दीक़ी

तिरे ख़याल से फिर आँख मेरी पुर-नम है

अरशद लतीफ़

ये माना सैल-ए-अश्क-ए-ग़म नहीं कुछ कम मगर 'अरशद'

अरशद कमाल

वो आए तो लगा ग़म का मुदावा हो गया है

अरशद कमाल

समुंदर से किसी लम्हे भी तुग़्यानी नहीं जाती

अरशद कमाल

किया है मैं ने ऐसा क्या कि ऐसा हो गया है

अरशद कमाल

कभी अंगड़ाई ले कर जब समुंदर जाग उठता है

अरशद कमाल

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