शोक Poetry (page 133)

तिरे दयार में कोई ग़म-आश्ना तो नहीं

अली जव्वाद ज़ैदी

नींद आ गई थी मंज़िल-ए-इरफ़ाँ से गुज़र के

अली जव्वाद ज़ैदी

कम-ज़र्फ़ एहतियात की मंज़िल से आए हैं

अली जव्वाद ज़ैदी

जो मक़्सद गिर्या-ए-पैहम का है वो हम समझते हैं

अली जव्वाद ज़ैदी

जवानी हरीफ़-ए-सितम है तो क्या ग़म

अली जव्वाद ज़ैदी

हम-सफ़र गुम रास्ते ना-पैद घबराता हूँ मैं

अली जव्वाद ज़ैदी

है ख़मोश आँसुओं में भी नशात-ए-कामरानी

अली जव्वाद ज़ैदी

ग़ैर पूछें भी तो हम क्या अपना अफ़्साना कहें

अली जव्वाद ज़ैदी

ऐश ही ऐश है न सब ग़म है

अली जव्वाद ज़ैदी

आँखों में अश्क भर के मुझ से नज़र मिला के

अली जव्वाद ज़ैदी

आँख कुछ बे-सबब ही नम तो नहीं

अली जव्वाद ज़ैदी

अब कोई ग़म ही नहीं है जो रुलाए मुझ को

अली इमरान

तुम किसी संग पे अब सर को टिका कर सो जाओ

अली इफ़्तिख़ार ज़ाफ़री

बर-सर-ए-बाद हुआ अपना ठिकाना सर-ए-राह

अली इफ़्तिख़ार ज़ाफ़री

उठेंगे मौत से पहले

अली अकबर नातिक़

सफ़ीर-ए-लैला-3

अली अकबर नातिक़

हुजूम-ए-गिर्या

अली अकबर नातिक़

हरीम-ए-दिल, कि सर-ब-सर जो रौशनी से भर गया

अली अकबर नातिक़

नशेमन ही के लुट जाने का ग़म होता तो क्या ग़म था

अली अहमद जलीली

काटी है ग़म की रात बड़े एहतिराम से

अली अहमद जलीली

मुस्तहिक़ वो लज़्ज़त-ए-ग़म का नहीं

अली अहमद जलीली

काटी है ग़म की रात बड़े एहतिराम से

अली अहमद जलीली

रूह की बात सुने जिस्म के तेवर देखे

अली अब्बास उम्मीद

मैं तो इक लम्हा-ए-परीदा रहा

अली अब्बास उम्मीद

ज़िंदा रहने की ये तरकीब निकाली मैं ने

अलीना इतरत

वो अर्ज़-ए-ग़म पे मश्वरा-ए-इख़्तिसार दे

अलीम उस्मानी

मौत आई है ज़माने की तो मर जाने दो

अलीम उस्मानी

तेरे जमाल की दोशीज़गी की क़ौस-ए-क़ुज़ह

अलीम सबा नवेदी

रूह अफ़्सुर्दा तबीअत मिरी ग़म-कोश हुई

अलीम मसरूर

इक राज़-ए-ग़म-ए-दिल जब ख़ुद रह न सका दिल तक

अलीम मसरूर

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