शोक Poetry (page 134)

इक जुनूँ कहिए उसे जो मिरे सर से निकला

अलीम मसरूर

चले बज़्म-ए-दौराँ से जब ज़हर पी के

अलीम मसरूर

वक़्त

अलीम दुर्रानी

वो तअल्लुक़ है तिरे ग़म से कि अल्लाह अल्लाह

अलीम अख़्तर

मआल-ए-ज़ब्त-ए-पैहम हो गई है

अलीम अख़्तर

हमें दुनिया में अपने ग़म से मतलब

अलीम अख़्तर

तू अगर दिल-नवाज़ हो जाए

अलीम अख़्तर

शरीक-ए-हाल-ए-दिल-ए-बे-क़रार आज भी है

अलीम अख़्तर

निगाह-ए-लुत्फ़ क्या कम हो गई है

अलीम अख़्तर

मोहब्बत क्या मोहब्बत का सिला क्या

अलीम अख़्तर

मोहब्बत का रग-ओ-पै में मिरी रूह-ए-रवाँ होना

अलीम अख़्तर

दिल को शाइस्ता-ए-एहसास-ए-तमन्ना न करें

अलीम अख़्तर

मैं अपनी जंग में तन-ए-तन्हा शरीक था

आलमताब तिश्ना

आइना-ख़ाना भी अंदोह-ए-तमन्ना निकला

आलमताब तिश्ना

कभी कभी कितना नुक़सान उठाना पड़ता है

आलम ख़ुर्शीद

कोई हुनर तो मिरी चश्म-ए-अश्क-बार में है

अकरम महमूद

यादें

अख़्तर-उल-ईमान

तन्हाई में

अख़्तर-उल-ईमान

सुकून

अख़्तर-उल-ईमान

मेरा दोस्त अबुल-हौल

अख़्तर-उल-ईमान

फ़ासला

अख़्तर-उल-ईमान

अपाहिज गाड़ी का आदमी

अख़्तर-उल-ईमान

कोई इलाज-ए-ग़म-ए-ज़िंदगी बता वाइज़

अख़्तर ज़ियाई

मिला जो कोई यहाँ रम्ज़-आशना न मुझे

अख़्तर ज़ियाई

अहद-ए-वफ़ा का क़र्ज़ अदा कर दिया गया

अख़्तर ज़ियाई

शाम

अख़्तर उस्मान

तू ने एक उम्र के बाद पूछा है हाल-ए-दिल

अख्तर शुमार

उस के नज़दीक ग़म-ए-तर्क-ए-वफ़ा कुछ भी नहीं

अख्तर शुमार

तिरे बग़ैर मसाफ़त का ग़म कहाँ कम है

अख्तर शुमार

अभी दिल में गूँजती आहटें मिरे साथ हैं

अख्तर शुमार

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