शोक Poetry (page 136)

शनासाई

अख़्तर पयामी

जो भी मिल जाता है घर-बार को दे देता हूँ

अख़्तर नज़्मी

ख़ुशी ही शर्त नहीं लुत्फ़-ए-ज़िंदगी के लिए

अख़तर मुस्लिमी

हाँ ये भी तरीक़ा अच्छा है तुम ख़्वाब में मिलते हो मुझ से

अख़तर मुस्लिमी

शिकवा इस का तो नहीं है जो करम छोड़ दिया

अख़तर मुस्लिमी

नाले मिरे जब तक मिरे काम आते रहेंगे

अख़तर मुस्लिमी

माइल-ए-लुत्फ़ है आमादा-ए-बे-दाद भी है

अख़तर मुस्लिमी

किस को कहते हैं जफ़ा क्या है वफ़ा याद नहीं

अख़तर मुस्लिमी

कहाँ जाएँ छोड़ के हम उसे कोई और उस के सिवा भी है

अख़तर मुस्लिमी

आँसुओं के तूफ़ाँ में बिजलियाँ दबी रखना

अख़तर मुस्लिमी

सू-ए-मक़्तल कोई दम साथ चले

अख्तर लख़नवी

हर बुत यहाँ टूटे हुए पत्थर की तरह है

अख़तर इमाम रिज़वी

वो ज़िंदगी है उस को ख़फ़ा क्या करे कोई

अख़्तर होशियारपुरी

शाख़ों पे ज़ख़्म हैं कि शगूफ़े खिले हुए

अख़्तर होशियारपुरी

न जब कोई शरीक-ए-ज़ात होगा

अख़्तर होशियारपुरी

मिरी निगाह का पैग़ाम बे-सदा जो हुआ

अख़्तर होशियारपुरी

मिरी निगाह का पैग़ाम बे-सदा जो हुआ

अख़्तर होशियारपुरी

दश्त-दर-दश्त अक्स-ए-दर है यहाँ

अख़्तर होशियारपुरी

बारहा ठिठका हूँ ख़ुद भी अपना साया देख कर

अख़्तर होशियारपुरी

जिस ने दुनिया भर के ग़म अपनाए थे

अख़्तर फ़िरोज़

नफ़रतों से चेहरा चेहरा गर्द था

अख़्तर फ़िरोज़

यूँ ख़ुद को ख़्वाहिशात के अक्सर दिखाए रंग

अख़तर बस्तवी

ज़ुल्म सहते रहे शुक्र करते रहे आई लब तक न ये दास्ताँ आज तक

अख़्तर अंसारी अकबराबादी

ज़िंदगी होगी मिरी ऐ ग़म-ए-दौराँ इक रोज़

अख़्तर अंसारी अकबराबादी

यारों के इख़्लास से पहले दिल का मिरे ये हाल न था

अख़्तर अंसारी अकबराबादी

नहीं आसान तर्क-ए-इश्क़ करना दिल से ग़म जाना

अख़्तर अंसारी अकबराबादी

लुटाओ जान तो बनती है बात किस ने कहा

अख़्तर अंसारी अकबराबादी

कैफ़ियत क्या थी यहाँ आलम-ए-ग़म से पहले

अख़्तर अंसारी अकबराबादी

फ़सुर्दा हो के मयख़ाने से निकले

अख़्तर अंसारी अकबराबादी

दूसरों का दर्द 'अख़्तर' मेरे दिल का दर्द है

अख़्तर अंसारी

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