शोक Poetry (page 138)

हंगामा-ए-आफ़ात इधर भी है उधर भी

अख़गर मुशताक़ रहीमाबादी

बेदाद-ए-तग़ाफ़ुल से तो बढ़ता नहीं ग़म और

अख़गर मुशताक़ रहीमाबादी

दिल दबा जाता है कितना आज ग़म के बार से

अकबर हैदराबादी

हर्फ़-ए-यक़ीं

अकबर हैदराबादी

दिल दबा जाता है कितना आज ग़म के बार से

अकबर हैदराबादी

दिल है न निशान बे-दिली का

अकबर हुसैन मोहानी इबरत

कई आवाज़ों की आवाज़ हूँ मैं

अकबर हमीदी

ये सितम इक ख़्वाहिश-ए-मौहूम पर

अकबर हैदरी

क़ौम के ग़म में डिनर खाते हैं हुक्काम के साथ

अकबर इलाहाबादी

जब ग़म हुआ चढ़ा लीं दो बोतलें इकट्ठी

अकबर इलाहाबादी

नई तहज़ीब

अकबर इलाहाबादी

वो हवा न रही वो चमन न रहा वो गली न रही वो हसीं न रहे

अकबर इलाहाबादी

न रूह-ए-मज़हब न क़ल्ब-ए-आरिफ़ न शाइराना ज़बान बाक़ी

अकबर इलाहाबादी

ख़ुशी है सब को कि ऑपरेशन में ख़ूब निश्तर ये चल रहा है

अकबर इलाहाबादी

हूँ मैं परवाना मगर शम्अ तो हो रात तो हो

अकबर इलाहाबादी

फ़लसफ़ी को बहस के अंदर ख़ुदा मिलता नहीं

अकबर इलाहाबादी

अपने पहलू से वो ग़ैरों को उठा ही न सके

अकबर इलाहाबादी

आह जो दिल से निकाली जाएगी

अकबर इलाहाबादी

वही गुमाँ है जो उस मेहरबाँ से पहले था

अकबर अली खान अर्शी जादह

तेरे सिवा किसी की तमन्ना करूँगा मैं

अजमल सिराज

पेश जो आया सर-ए-साहिल शब बतलाया

अजमल सिराज

जो अश्क बरसा रहे हैं साहिब

अजमल सिराज

हम अपने-आप में रहते हैं दम में दम जैसे

अजमल सिराज

दुश्वार है इस अंजुमन-आरा को समझना

अजमल सिराज

और तो ख़ैर क्या रह गया

अजमल सिराज

ज़िंदगी रोज़ बनाती है बहाने क्या क्या

अजमल सिद्दीक़ी

न नज़र से कोई गुज़र सका न ही दिल से मलबा हटा सका

अजमल सिद्दीक़ी

तार-ए-नज़र भी ग़म की तमाज़त से ख़ुश्क है

अजमल अजमली

हज़ार मंज़िल-ए-ग़म से गुज़र चुके लेकिन

अजमल अजमली

याद-ए-फ़िराक-ए-यार तिरा शुक्रिया बहुत

अजमल अजमली

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