शोक Poetry (page 131)

मिरी क़ुर्बतों की ख़ातिर यूँही बे-क़रार होता

आलोक यादव

खुला है ज़ीस्त का इक ख़ुशनुमा वरक़ फिर से

आलोक यादव

इक ज़रा सी चाह में जिस रोज़ बिक जाता हूँ मैं

आलोक यादव

भरे जो ज़ख़्म तो दाग़ों से क्यूँ उलझें?

आलोक यादव

सवालों में ख़ुद भी है डूबी उदासी

आलोक मिश्रा

दिल पर किसी की बात का ऐसा असर न था

आलोक मिश्रा

लगे जब सुबह की कश्ती किनारे शब

अलमास शबी

कभी छोड़ी हुई मंज़िल भी याद आती है राही को

अल्लामा इक़बाल

वालिदा मरहूमा की याद में

अल्लामा इक़बाल

तुलू-ए-इस्लाम

अल्लामा इक़बाल

शिकवा

अल्लामा इक़बाल

नानक

अल्लामा इक़बाल

जवाब-ए-शिकवा

अल्लामा इक़बाल

गोरिस्तान-ए-शाही

अल्लामा इक़बाल

एक आरज़ू

अल्लामा इक़बाल

तिरी निगाह फ़रोमाया हाथ है कोताह

अल्लामा इक़बाल

ताज़ा फिर दानिश-ए-हाज़िर ने किया सेहर-ए-क़ादिम

अल्लामा इक़बाल

सितारों से आगे जहाँ और भी हैं

अल्लामा इक़बाल

समा सकता नहीं पहना-ए-फ़ितरत में मिरा सौदा

अल्लामा इक़बाल

परेशाँ हो के मेरी ख़ाक आख़िर दिल न बन जाए

अल्लामा इक़बाल

करेंगे अहल-ए-नज़र ताज़ा बस्तियाँ आबाद

अल्लामा इक़बाल

आलम-ए-आब-ओ-ख़ाक-ओ-बाद सिर्र-ए-अयाँ है तू कि मैं

अल्लामा इक़बाल

उस का ग़म अपनी तलब छीन के ले जाएगा

अलीमुल्लाह हाली

ना-शनासी का हमेशा ग़म रहा

अलीमुल्लाह हाली

है ग़म-ए-हिज्र न अब ज़ौक़-ए-तलब कुछ भी नहीं

अलीमुल्लाह हाली

ख़यालात रंगीं नहीं बोलते उस को ज्यूँ बास फूलों के रंगों में रहिए

अलीमुल्लाह

राज़-ए-ग़म-ए-उल्फ़त को ये दुनिया न समझ ले

अली ज़हीर लखनवी

न आसमाँ की कहानी न वाँ का क़िस्सा लिख

अली ज़हीर लखनवी

किसे बताएँ कि क्या ग़म रहा है आँखों में

अली ज़हीर लखनवी

पूरी हुई जो हिज्र की मीआद आवेगा

अली यासिर

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