शोक Poetry (page 130)

इस दौर से ख़ुलूस मोहब्बत वफ़ा न माँग

अमीर अहमद ख़ुसरव

बीन हवा के हाथों में है लहरे जादू वाले हैं

अमीक़ हनफ़ी

अर्ज़-ए-मुद्दआ करते क्यूँ नहीं किया हम ने

अमीक़ हनफ़ी

'अमीक़' छेड़ ग़ज़ल ग़म की इंतिहा कब है

अमीक़ हनफ़ी

हो सके तो दिल-ए-सद-चाक दिखाया जाए

अमीन राहत चुग़ताई

उस ने जो ग़म किए हवाले थे

अमीन अडीराई

क़िस्सा-ए-ख़ाक तो कुछ ख़ाक से आगे तक था

अमीन अडीराई

इक अश्क सर-ए-शोख़ी-ए-रुख़सार में गुम है

अमीन अडीराई

ये शो'ले आज़माना जानते हैं

अंबरीन हसीब अंबर

ये शो'ले आज़माना जानते हैं

अंबरीन हसीब अंबर

तुम्हारा जो सहारा हो गया है

अंबरीन हसीब अंबर

मिला भी ज़ीस्त में क्या रन्ज-ए-रह-गुज़ार से कम

अंबरीन हसीब अंबर

हो गई बात पुरानी फिर भी

अंबरीन हसीब अंबर

बहते हुए अश्कों की रवानी नहीं लिक्खी

अंबरीन हसीब अंबर

साएबाँ क्या अब्र का टुकड़ा है क्या

अम्बर शमीम

जहाँ में हर बशर मजबूर हो ऐसा नहीं होता

अम्बर खरबंदा

किसे ख़याल कि इशरत के बाब कितने हैं

अमर सिंह फ़िगार

जब कोई रास्ता नहीं होता

अमर सिंह फ़िगार

किस तरह 'अमानत' न रहूँ ग़म से मैं दिल-गीर

अमानत लखनवी

दिखलाए ख़ुदा उस सितम-ईजाद की सूरत

अमानत लखनवी

भूला हूँ मैं आलम को सरशार इसे कहते हैं

अमानत लखनवी

कुछ हँसी खेल सँभलना ग़म-ए-हिज्राँ में नहीं

अल्ताफ़ हुसैन हाली

नशात-ए-उमीद

अल्ताफ़ हुसैन हाली

मुनाजात-ए-बेवा

अल्ताफ़ हुसैन हाली

हुब्ब-ए-वतन

अल्ताफ़ हुसैन हाली

उस के जाते ही ये क्या हो गई घर की सूरत

अल्ताफ़ हुसैन हाली

हश्र तक याँ दिल शकेबा चाहिए

अल्ताफ़ हुसैन हाली

हक़ीक़त महरम-ए-असरार से पूछ

अल्ताफ़ हुसैन हाली

दिल को दर्द-आश्ना किया तू ने

अल्ताफ़ हुसैन हाली

अब वो अगला सा इल्तिफ़ात नहीं

अल्ताफ़ हुसैन हाली

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