शोक Poetry (page 129)

थी सियाहियों का मस्कन मिरी ज़िंदगी की वादी

आमिर उस्मानी

न सकत है ज़ब्त-ए-ग़म की न मजाल-ए-अश्क-बारी

आमिर उस्मानी

लौटे कुछ इस तरह तिरी जल्वा-सरा से हम

आमिर उस्मानी

इश्क़ के मराहिल में वो भी वक़्त आता है

आमिर उस्मानी

ग़म-ए-बेहद में किस को ज़ब्त का मक़्दूर होता है

आमिर उस्मानी

दर्द बढ़ता गया जितने दरमाँ किए प्यास बढ़ती गई जितने आँसू पिए

आमिर उस्मानी

मैं ने तूफ़ान से पहले का इशारा देखा

आमिर रियाज़

ज़मीं के जिस्म पे यूँ यूरिश-ए-क़ज़ा कब तक

आमिर नज़र

तअ'ल्लुक़ात के सारे दिए बुझे हुए थे

आमिर नज़र

सहर की जुम्बिश क़द-ए-मतानत पे रह गई थी

आमिर नज़र

जबीं को चैन कहाँ ज़ेर-ए-लब दुआ है बस

आमिर नज़र

एक इक तार-ए-नफ़स आशुफ़्ता-ए-आहंग था

आमिर नज़र

दरपेश तो हैं दीदा-ए-हैरान हज़ारों

आमिर नज़र

चश्म-ए-बे-कैफ़ में कारिंदा-ए-मंज़र न रहा

आमिर नज़र

तह कर चुके बिसात-ए-ग़म-ओ-फ़िक्र-ए-रोज़गार

अमीर हम्ज़ा साक़िब

न तो बे-करानी-ए-दिल रही न तो मद्द-ओ-जज़्र-ए-तलब रहा

अमीर हम्ज़ा साक़िब

ख़ुश-आमदीद कहता गुलों का जहान था

अमीर हम्ज़ा साक़िब

हैरान बहुत ताबिश-ए-हुस्न-दीगराँ थी

अमीर हम्ज़ा साक़िब

दश्त-ए-बला-ए-शौक़ में ख़ेमे लगाए हैं

अमीर हम्ज़ा साक़िब

होना पड़ा है ख़ूगर-ए-ग़म भी ख़ुशी की ख़ैर

अमीर क़ज़लबाश

नदी के पार उजाला दिखाई देता है

अमीर क़ज़लबाश

लोग बनते हैं होशियार बहुत

अमीर क़ज़लबाश

हर रहगुज़र में काहकशाँ छोड़ जाऊँगा

अमीर क़ज़लबाश

तिरा क्या काम अब दिल में ग़म-ए-जानाना आता है

अमीर मीनाई

न बेवफ़ाई का डर था न ग़म जुदाई का

अमीर मीनाई

मुझ मस्त को मय की बू बहुत है

अमीर मीनाई

कहा जो मैं ने कि यूसुफ़ को ये हिजाब न था

अमीर मीनाई

गुज़र को है बहुत औक़ात थोड़ी

अमीर मीनाई

अमीर लाख इधर से उधर ज़माना हुआ

अमीर मीनाई

ख़त का इंतिज़ार

अमीर औरंगाबादी

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