शोक Poetry (page 31)

दिल दिया है हम ने भी वो माह-ए-कामिल देख कर

शेर सिंह नाज़ देहलवी

ये इक़ामत हमें पैग़ाम-ए-सफ़र देती है

ज़ौक़

उस संग-ए-आस्ताँ पे जबीन-ए-नियाज़ है

ज़ौक़

क़ुफ़्ल-ए-सद-ख़ाना-ए-दिल आया जो तू टूट गए

ज़ौक़

नहीं सबात बुलंदी-ए-इज्ज़-ओ-शाँ के लिए

ज़ौक़

न करता ज़ब्त मैं नाला तो फिर ऐसा धुआँ होता

ज़ौक़

मिरे सीने से तेरा तीर जब ऐ जंग-जू निकला

ज़ौक़

महफ़िल में शोर-ए-क़ुलक़ुल-ए-मीना-ए-मुल हुआ

ज़ौक़

लेते ही दिल जो आशिक़-ए-दिल-सोज़ का चले

ज़ौक़

ख़त बढ़ा काकुल बढ़े ज़ुल्फ़ें बढ़ीं गेसू बढ़े

ज़ौक़

जुदा हों यार से हम और न हो रक़ीब जुदा

ज़ौक़

हुए क्यूँ उस पे आशिक़ हम अभी से

ज़ौक़

हाथ सीने पे मिरे रख के किधर देखते हो

ज़ौक़

इक सदमा दर्द-ए-दिल से मिरी जान पर तो है

ज़ौक़

दूद-ए-दिल से है ये तारीकी मिरे ग़म-ख़ाना में

ज़ौक़

चुपके चुपके ग़म का खाना कोई हम से सीख जाए

ज़ौक़

ऐ 'ज़ौक़' वक़्त नाले के रख ले जिगर पे हाथ

ज़ौक़

यूँ अपने दिल के बोझ को कुछ कम किया गया

शहज़ाद रज़ा लम्स

ये काएनात तिरा मोजज़ा लगे है मुझे

शहज़ाद रज़ा लम्स

कौन से दिन तिरी याद ऐ बुत-ए-सफ़्फ़ाक नहीं

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

इधर माइल कहाँ वो मह-जबीं है

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

है बद बला किसी को ग़म-ए-जावेदाँ न हो

मुस्तफ़ा ख़ाँ शेफ़्ता

रक़ाबतों की तरह से हम ने मोहब्बतें बे-मिसाल की हैं

शीश मोहम्मद इस्माईल आज़मी

वही न मिलने का ग़म और वही गिला होगा

शीन काफ़ निज़ाम

पुरखों से जो मिली है वो दौलत भी ले न जाए

शीन काफ़ निज़ाम

अब तेरे इंतिज़ार की आदत नहीं रही

शाज़िया अकबर

सुख़न राज़-ए-नशात-ओ-ग़म का पर्दा हो ही जाता है

शाज़ तमकनत

क़ैद-ए-हयात ओ बंद-ए-ग़म

शाज़ तमकनत

वो गदा-गरान-ए-जल्वा सर-ए-रहगुज़ार चुप थे

शाज़ तमकनत

सुख़न राज़-ए-नशात-ओ-ग़म का पर्दा हो ही जाता है

शाज़ तमकनत

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