शोक Poetry (page 32)

शब-ए-वा'दा कह गई है शब-ए-ग़म दराज़ रखना

शाज़ तमकनत

शब ओ रोज़ जैसे ठहर गए कोई नाज़ है न नियाज़ है

शाज़ तमकनत

सन कर बयान-ए-दर्द कलेजा दहल न जाए

शाज़ तमकनत

नफ़स नफ़स है तिरे ग़म से चूर चूर अब तक

शाज़ तमकनत

मिरे नसीब ने जब मुझ से इंतिक़ाम लिया

शाज़ तमकनत

मैं लौट आऊँ कहीं तू ये सोचता ही न हो

शाज़ तमकनत

कुछ अजब आन से लोगों में रहा करते थे

शाज़ तमकनत

कौन देता रहा सहरा में सदा मेरी तरह

शाज़ तमकनत

हयात रास न आए अजल बहाना करे

शाज़ तमकनत

एक रात आप ने उम्मीद पे क्या रक्खा है

शाज़ तमकनत

बड़े ख़ुलूस से दामन पसारता है कोई

शाज़ तमकनत

हज़ारों मुश्किलें हैं और लाखों ग़म लिए हैं हम

शायान क़ुरैशी

ज़ाविए फ़िक्र के अब और बनाओ यारो

शौक़ सालकी

हाथ उठाता हूँ मैं अब दुआ के लिए

शौक़ सालकी

हुई या मुझ से नफ़रत या कुछ इस में किब्र-ओ-नाज़ आया

शौक़ क़िदवाई

दिल खोटा है हम को उस से राज़-ए-इश्क़ न कहना था

शौक़ क़िदवाई

रो रही है जिस तरह ये शम्अ परवाने के बाद

शौक़ देहलवी मक्की

ज़ाहिरन ये बुत तो हैं नाज़ुक गुल-ए-तर की तरह

शौक़ बहराइची

न दे साक़ी मुझे कुछ ग़म नहीं है

शौक़ बहराइची

मह-जबीनों की मोहब्बत का नतीजा न मिला

शौक़ बहराइची

है शैख़ ओ बरहमन पर ग़ालिब गुमाँ हमारा

शौक़ बहराइची

आटा

शौकत थानवी

फूँक कर सारा चमन जब वो शरीक-ए-ग़म हुए

शौकत परदेसी

शुऊ'र-ए-कैफ़-ओ-ख़ुशी है ज़रा ठहर जाओ

शौकत परदेसी

रात तारों से जब सँवरती है

शौकत परदेसी

मुझ को जहाँ में कोई दिल-आरा नहीं मिला

शौकत परदेसी

मेरे महबूब मिरे दिल को जलाया न करो

शौकत परदेसी

एक वहशत है रहगुज़ारों में

शौकत परदेसी

ये रात कितनी भयानक है बाम-ओ-दर के लिए

शातिर हकीमी

मिरे दिल पे तेरा क़ब्ज़ा मिरा इख़्तियार तू है

शातिर हकीमी

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