शोक Poetry (page 52)

कभी कभी अर्ज़-ए-ग़म की ख़ातिर हम इक बहाना भी चाहते हैं

सलाम मछली शहरी

सड़क बन रही है

सलाम मछली शहरी

अस्पताल

सलाम मछली शहरी

सुब्ह-दम भी यूँ फ़सुर्दा हो गया

सलाम मछली शहरी

न मौज-ए-बादा न ज़ुल्फ़ों न इन घटाओं ने

सलाम मछली शहरी

काश तुम समझ सकतीं ज़िंदगी में शाएर की ऐसे दिन भी आते हैं

सलाम मछली शहरी

कभी कभी अर्ज़-ए-ग़म की ख़ातिर हम इक बहाना भी चाहते हैं

सलाम मछली शहरी

इन ग़ज़ालान-ए-तरह-दार को कैसे छोड़ूँ

सलाम मछली शहरी

आवाज़ों से जिस्म हुआ नम

सलाहुद्दीन महमूद

आवाज़ों से जिस्म हुआ नम

सलाहुद्दीन महमूद

पहलू में बैठ कर वो पाते क्या

सख़ी लख़नवी

हम पे जौर-ओ-सितम के क्या मअनी

सख़ी लख़नवी

है चमन में रहम गुलचीं को न कुछ सय्याद को

सख़ी लख़नवी

राह में कोई खड़ा हो जैसे

शख़ावत शमीम

ज़ख़्म खुले पड़ते हैं दिल के मौसम है ये बहारों का

सज्जाद बाक़र रिज़वी

वो माह-वश है ज़मीं पर नज़र झुकाए हुए

सज्जाद बाक़र रिज़वी

वो घिर के आया घटाओं की तीरगी की तरह

सज्जाद बाक़र रिज़वी

उसे मैं तलाश कहाँ करूँ वो उरूज है मैं ज़वाल हूँ

सज्जाद बाक़र रिज़वी

उस सादा-दिल से कुछ मुझे 'बाक़र' गिला न था

सज्जाद बाक़र रिज़वी

उन से वो रस्म-ए-मुलाक़ात चली जाती है

सज्जाद बाक़र रिज़वी

तुझे मैं मिलूँ तो कहाँ मिलूँ मिरा तुझ से रब्त मुहाल है

सज्जाद बाक़र रिज़वी

तिरे तग़ाफ़ुल से है शिकायत न अपने मिटने का कोई ग़म है

सज्जाद बाक़र रिज़वी

तेरे शैदा भी हुए इश्क़-ए-तमाशा भी हुए

सज्जाद बाक़र रिज़वी

कार-ए-वहशत में भी मजबूर है इंसाँ अब तक

सज्जाद बाक़र रिज़वी

हम राज़-ए-गिरफ़्तारी-ए-दिल जान गए हैं

सज्जाद बाक़र रिज़वी

हो दिल-लगी में भी दिल की लगी तो अच्छा है

सज्जाद बाक़र रिज़वी

है दुकान-ए-शौक़ भरी हुई कोई मेहरबाँ हो तो ले के आ

सज्जाद बाक़र रिज़वी

हाल-ए-दिल कुछ जो सर-ए-बज़्म कहा है मैं ने

सज्जाद बाक़र रिज़वी

दिल है तो मुक़ामात-ए-फुग़ाँ और भी होंगे

सज्जाद बाक़र रिज़वी

बे-दिली वो है कि मरने की तमन्ना भी नहीं

सज्जाद बाक़र रिज़वी

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