शोक Poetry (page 51)
सितारे की तरह सीने में दिल डूबा किया लेकिन
सालिक लखनवी
वुसअ'त-ए-दामान-ए-दिल को ग़म तुम्हारा मिल गया
सालिक लखनवी
मुझ ना-तवाँ पे हश्र में वहम-ए-फुग़ाँ ग़लत
सालिक देहलवी
रहा वो शहर में जब तक बड़ा दबंग रहा
सलीम शहज़ाद
मंज़र मिरी आँखों में रहे दश्त-ए-सफ़र के
सलीम शाहिद
तू ने ग़म ख़्वाह-मख़ाह उस का उठाया हुआ है
सलीम सरफ़राज़
वो जिन के नक़्श-ए-क़दम देखने में आते हैं
सलीम कौसर
न कोई नाम ओ नसब है न गोश्वारा मिरा
सलीम कौसर
कैसे हंगामा-ए-फ़ुर्सत में मिले हैं तुझ से
सलीम कौसर
जुनूँ तब्दीली-ए-मौसम का तक़रीरों की हद तक है
सलीम कौसर
चराग़-ए-याद की लौ हम-सफ़र कहाँ तक है
सलीम कौसर
हर-चंद तिरे ग़म का सहारा भी नहीं है
सलीम फ़राज़
अभी मौजूद थी लेकिन अभी गुम हो गई है
सलीम फ़राज़
मैं वो मअ'नी-ए-ग़म-ए-इश्क़ हूँ जिसे हर्फ़ हर्फ़ लिखा गया
सलीम अहमद
मैं ग़म को बसा रहा हूँ दिल में
सलीम अहमद
हाल-ए-दिल ना-गुफ़्तनी है हम जो कहते भी तो क्या
सलीम अहमद
बहुत तवील मिरी दास्तान-ए-ग़म थी मगर
सलीम अहमद
खेल
सलीम अहमद
ज़िंदगी मौत के पहलू में भली लगती है
सलीम अहमद
मिला जो काम ग़म-ए-मो'तबर बनाने का
सलीम अहमद
माने तो किस की दीवाना माने
सलीम अहमद
लम्हा-ए-रफ़्ता का दिल में ज़ख़्म सा बन जाएगा
सलीम अहमद
किसी दश्त का लब-ए-ख़ुश्क हूँ जो न पाए मुज़्दा-ए-आब तक
सलीम अहमद
जिस का इंकार भी इंकार न समझा जाए
सलीम अहमद
जाने किसी ने क्या कहा तेज़ हवा के शोर में
सलीम अहमद
दिल हुस्न को दान दे रहा हूँ
सलीम अहमद
यूँ बाग़बाँ ने मोहर लगा दी ज़बान पर
सलाम संदेलवी
मता-ए-ग़म मिरे अश्कों ही तक नहीं महदूद
सलाम संदेलवी
बू-ए-गुल बाद-ए-सबा लाई बहुत देर के बा'द
सलाम संदेलवी
रात दिल को था सहर का इंतिज़ार
सलाम मछली शहरी
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