शोक Poetry (page 49)

तश्कील बदर की है कभी है हिलाल की

सरीर काबिरी

जिसे तू ने समझा है ज़िंदगी उसी इंक़लाब का नाम है

सरीर काबिरी

लाख हो माज़ी दामन-गीर

सरदार सोज़

दर-ए-मय-कदा है खुला हुआ सर-ए-चर्ख़ आज घटा भी है

सरदार सोज़

ऐसा नहीं कि उन से मोहब्बत नहीं मुझे

सरदार सोज़

मौजा-ए-रेग-ए-रवान-ए-ग़म में बह के देखना

सरदार सलीम

आज दीवाने का ज़ौक़-ए-दीद पूरा हो गया

सरदार सलीम

वुसअ'त-ए-बहर-ए-इश्क़ क्या कहिए

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

तेरी महफ़िल में जितने ऐ सितम-गर जाने वाले हैं

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

नासेहा आया नसीहत है सुनाने के लिए

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

मैं वो आतिश-ए-नफ़स हूँ आग अभी

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

की मय से हज़ार बार तौबा

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

काली घटा कब आएगी फ़स्ल-ए-बहार में

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

बोसा देते हो अगर तुम मुझ को दो दो सब के दो

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

ये झूट है कि बिछड़ने का उस को ग़म भी नहीं

सदार आसिफ़

ग़मों ने घेर लिया है मुझे तो क्या ग़म है

सरदार अंजुम

सितमगर तुझ से हम कब शिकवा-ए-बेदाद करते हैं

सरस्वती सरन कैफ़

सरख़ुशी मेरे लिए असबाब-ए-ग़म मेरे लिए

सरस्वती सरन कैफ़

कहीं ये तस्कीन-ए-दिल न देखी कहीं ये आराम-ए-जाँ न देखा

सरस्वती सरन कैफ़

हम सोज़-ए-दिल बयाँ करें तुम से कहाँ तलक

सरस्वती सरन कैफ़

एक नाज़ुक दिल के अंदर हश्र बरपा कर दिया

सरस्वती सरन कैफ़

चलेगी न ऐ दिल कोई घात हरगिज़

सरस्वती सरन कैफ़

चराग़ जब मेरा कमरा नापता है

सारा शगुफ़्ता

सुनने वाले रो दिए सुन कर मरीज़-ए-ग़म का हाल

साक़िब लखनवी

आधी से ज़ियादा शब-ए-ग़म काट चुका हूँ

साक़िब लखनवी

यूँ अकेला दश्त-ए-ग़ुर्बत में दिल-ए-नाकाम था

साक़िब लखनवी

वस्ल की उम्मीद बढ़ते बढ़ते थक कर रह गई

साक़िब लखनवी

मैं नहीं कहता कि दुनिया को बदल कर राह चल

साक़िब लखनवी

कौन इन लाखों अदाओं में मुझे प्यारी नहीं

साक़िब लखनवी

कहाँ तक जफ़ा हुस्न वालों की सहते

साक़िब लखनवी

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