घर Poetry (page 111)

तन्हाई का सफ़रनामा

अंजुम सलीमी

मैं और मेरी तन्हाई

अंजुम सलीमी

गिर्या

अंजुम सलीमी

बे-मसरफ़ रिश्तों की फ़राग़त

अंजुम सलीमी

उम्र की सारी थकन लाद के घर जाता हूँ

अंजुम सलीमी

सब को अपने ज़ेहन से झटका ख़ुद को याद किया

अंजुम सलीमी

दिन ले के जाऊँ साथ उसे शाम कर के आऊँ

अंजुम सलीमी

अदू तो क्या ये फ़लक भी उसे सता न सका

अंजुम मानपुरी

खोया खोया रहता है

अंजुम लुधियानवी

काँटों में जो फूल खिला है

अंजुम लुधियानवी

जाने किस की आहट का इंतिज़ार करता है

अंजुम लुधियानवी

कोई तोहमत हो मिरे नाम चली आती है

अंजुम ख़याली

मिरे मज़ार पे आ कर दिए जलाएगा

अंजुम ख़याली

कोई तोहमत हो मिरे नाम चली आती है

अंजुम ख़याली

घर में मिट्टी का दिया मौजूद है

अंजुम ख़याली

ऐ शब-ए-ग़म जो हम भी घर जाएँ

अंजुम ख़याली

क्या जानें सफ़र ख़ैर से गुज़रे कि न गुज़रे

अंजुम ख़लीक़

यहाँ जो ज़ख़्म मिलते हैं वो सिलते हैं यहीं मेरे

अंजुम ख़लीक़

जहाँ सीनों में दिल शानों पे सर आबाद होते हैं

अंजुम ख़लीक़

दस्तार-ए-हुनर बख़्शिश-ए-दरबार नहीं है

अंजुम ख़लीक़

बीते हुए लम्हात को पहचान में रखना

अंजुम ख़लीक़

आबादियों में कैसे दरिंदे घुस आए हैं

अंजुम इरफ़ानी

तेशा-ब-कफ़ को आइना-गर कह दिया गया

अंजुम इरफ़ानी

लहजे का रस हँसी की धनक छोड़ कर गया

अंजुम इरफ़ानी

इस ने देखा है सर-ए-बज़्म सितमगर की तरह

अंजुम इरफ़ानी

बड़ी फ़र्ज़-आश्ना है सबा करे ख़ूब काम हिसाब का

अंजुम इरफ़ानी

अब इस सादा कहानी को नया इक मोड़ देना था

अंजुम इरफ़ानी

ख़याल जान से बढ़ कर सफ़र में रहता है

अंजुम बाराबंकवी

ख़ाली भी तो कर ख़ाना-ए-दिल दुनिया से

अंजुम आज़मी

वा'दा है कि जब रोज़-ए-जज़ा आएगा

अंजुम आज़मी

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