घर Poetry (page 110)

रात आई है बलाओं से रिहाई देगी

अनवर मसूद

हवा के साथ उड़ जाएगा पानी

अनवर ख़ान

शहर की गलियों और सड़कों पर फिरते हैं मायूसी में

अनवर जमाल अनवर

रोज़ उठ जाती है घर में कोई दीवार नई

अनवर जमाल अनवर

रात का क्या ज़िक्र है शाम-ओ-सहर आया नहीं

अनवर जमाल अनवर

चढ़ते तूफ़ान को साहिल से गुज़रना था मियाँ

अनवर जमाल अनवर

बे-घर था फिर छोड़ गया घर जाने क्यूँ

अनवर जमाल अनवर

शादाब-ओ-शगुफ़्ता कोई गुलशन न मिलेगा

अनवर जलालपुरी

क़याम-गाह न कोई न कोई घर मेरा

अनवर जलालपुरी

मैं हर बे-जान हर्फ़-ओ-लफ़्ज़ को गोया बनाता हूँ

अनवर जलालपुरी

बातें पागल हो जाती हैं

अनवार फ़ितरत

यूसुफ़-ए-हुस्न का हुस्न आप ख़रीदार रहा

अनवर देहलवी

अश्क बेताब व निगह बे-बाक व चश्म-ए-तर ख़राब

अनवर देहलवी

ये नर्म हाथ मरे हाथ में थमा दीजे

अनवर अंजुम

खिला है फूल बहुत रोज़ में मुक़द्दर का

अनवर अंजुम

कब लज़्ज़तों ने ज़ेहन का पीछा नहीं किया

अनवर अंजुम

हुआ करे अगर उस को कोई गिला होगा

अनवर अंजुम

हुआ करे अगर उस को कोई गिला होगा

अनवर अंजुम

धूप हो गए साए जल गए शजर जैसे

अनवर अंजुम

चुप बैठा में अक्सर सोचता रहता हूँ

अनवर अंजुम

डूबते तारों से पूछो न क़मर से पूछो

अनवर मोअज़्ज़म

जो हो सका न मिरा उस को भूल जाऊँ मैं

अनवर महमूद खालिद

जो हो सका न मिरा उस को भूल जाऊँ मैं

अनवर महमूद खालिद

अन-कहे लफ़्ज़ों में मतलब ढूँढता रहता हूँ मैं

अनवर महमूद खालिद

अन-कहे लफ़्ज़ों का मतलब ढूँढता रहता हूँ मैं

अनवर महमूद खालिद

ये दिल ही जानता है फिर कहाँ कहाँ भटके

अनुभव गुप्ता

सितम सहने की तय्यारी भी कोई चीज़ होती है

अनुभव गुप्ता

लम्हा लम्हा अपनी ज़हरीली बातों से डसता था

अंजुम तराज़ी

हर घर के मकीनों ने ही दर खोले हुए थे

अंजुम तराज़ी

दिमाग़ उन के तजस्सुस में जिस्म घर में रहा

अंजुम सिद्दीक़ी

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