घर Poetry (page 44)

हमल-सरा

साक़ी फ़ारुक़ी

घर

साक़ी फ़ारुक़ी

कैमरा

साक़ी फ़ारुक़ी

अजनबी

साक़ी फ़ारुक़ी

ज़मानों के ख़राबों में उतर कर देख लेता हूँ

साक़ी फ़ारुक़ी

ये किस ने भरम अपनी ज़मीं का नहीं रक्खा

साक़ी फ़ारुक़ी

वो लोग जो ज़िंदा हैं वो मर जाएँगे इक दिन

साक़ी फ़ारुक़ी

वहशत दीवारों में चुनवा रक्खी है

साक़ी फ़ारुक़ी

सुर्ख़ चमन ज़ंजीर किए हैं सब्ज़ समुंदर लाया हूँ

साक़ी फ़ारुक़ी

रात नादीदा बलाओं के असर में हम थे

साक़ी फ़ारुक़ी

मुझे ख़बर थी मिरा इंतिज़ार घर में रहा

साक़ी फ़ारुक़ी

अभी नज़र में ठहर ध्यान से उतर के न जा

साक़ी फ़ारुक़ी

सामने जब कोई भरपूर जवानी आए

साक़ी अमरोहवी

ख़ुशबुओं का शजर नहीं देखा

संजीव आर्या

ख़राब हो गया जब मेरे जिस्म का काग़ज़

संजय मिश्रा शौक़

वो मेरे हाल-ए-दिल से इस क़दर भी बे-ख़बर होगा

संदीप कोल नादिम

आसेब-सिफ़त ये मिरी तन्हाई अजब है

समीना राजा

पत्थर की नींद सोती है बस्ती जगाइए

समद अंसारी

जब शाम शहर में आती है

सलमान सईद

राह मिलती है घर नहीं मिलता

सलमान सईद

बग़दाद

सलमान अंसारी

मय-कशी छोड़ दी तौहीन-ए-हुनर कर आया

सलमान अंसारी

मुझे ख़बर न थी इस घर में कितने कमरे हैं

सलमान अख़्तर

क्या नहीं जानता मुझे कोई

सलमान अख़्तर

रह गया कम ही गो सफ़र बाक़ी

सलमान अख़्तर

मैं तुझ से लाख बिछड़ कर यहाँ वहाँ जाता

सलमान अख़्तर

क्या दिखाता है ये सफ़र देखो

सलमान अख़्तर

किसी क़िस्मत में एक घर निकला

सलमान अख़्तर

जीना अज़ाब क्यूँ है ये क्या हो गया मुझे

सलमान अख़्तर

आए हैं घर मिरा सजाने दर्द

सलमान अख़्तर

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