घर Poetry (page 43)

माल-ओ-मता-ए-कूचा-ओ-बाज़ार बिक गए

सरफ़राज़ सय्यद

इश्क़ में कुछ इस सबब से भी है आसानी मुझे

सरफ़राज़ शाहिद

ऐसे लगे है नौकरी माल-ए-हराम के बग़ैर

सरफ़राज़ शाहिद

फ़िक्र ओ एहसास के तपते हुए मंज़र तक आ

सरदार सलीम

बना देगी ज़मीं को आज शायद आसमाँ बारिश

सरदार सलीम

आज दीवाने का ज़ौक़-ए-दीद पूरा हो गया

सरदार सलीम

तिरा आना मिरे घर हो गया घर ग़ैर के जाना

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

काबा को अगर मानें कि अल्लाह का घर है

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

ऐ शैख़ ये जो मानें का'बा ख़ुदा का घर है

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

तुम्हें शब-ए-व'अदा दर्द-ए-सर था ये सब हैं बे-ए'तिबार बातें

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

कोई उस से नहीं कहता कि ये क्या बेवफ़ाई है

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

इलाही ख़ैर हो वो आज क्यूँ कर तन के बैठे हैं

सरदार गेंडा सिंह मशरिक़ी

ये कैसे मरहले में फँस गया है मेरा घर मालिक

सदार आसिफ़

सुना है धूप को घर लौटने की जल्दी है

सदार आसिफ़

ये ख़ल्क़ सारी हवा मेरे नाम कर देगी

सदार आसिफ़

ये झूट है कि बिछड़ने का उस को ग़म भी नहीं

सदार आसिफ़

ख़ता उस की मुआफ़ी से बड़ी है

सदार आसिफ़

हमारी काविश-ए-शेर-ओ-सुख़न बे-कार जाती है

सदार आसिफ़

तेरा मेरा झगड़ा क्या जब इक आँगन की मिट्टी है

सरदार अंजुम

कैसे टहलता है चाँद

सारा शगुफ़्ता

ऐ मेरे सर-सब्ज़ ख़ुदा

सारा शगुफ़्ता

आँखें दो जुडवाँ बहनें

सारा शगुफ़्ता

आधा कमरा

सारा शगुफ़्ता

यूँ अकेला दश्त-ए-ग़ुर्बत में दिल-ए-नाकाम था

साक़िब लखनवी

मैं नहीं कहता कि दुनिया को बदल कर राह चल

साक़िब लखनवी

मुझे ख़बर थी मिरा इंतिज़ार घर में रहा

साक़ी फ़ारुक़ी

अब घर भी नहीं घर की तमन्ना भी नहीं है

साक़ी फ़ारुक़ी

शेर-इमदाद-अली का मेडक

साक़ी फ़ारुक़ी

मुर्दा-ख़ाना

साक़ी फ़ारुक़ी

मुहासबा

साक़ी फ़ारुक़ी

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