घर Poetry (page 45)

थी ये उम्मीद कि वो लौट के घर आएगा

सलमा शाहीन

मसअला हुस्न-ए-तख़य्युल का है न इल्हाम का है

सलमा शाहीन

न छीन ले कहीं तन्हाई डर सा रहता है

सालिम सलीम

कनार-ए-आब तिरे पैरहन बदलने का

सालिम सलीम

अब ऐसी बातें कोई करे जो सब के मन को लुभा जाएँ

सालिक लखनवी

अब ज़मीनों को बिछाए कि फ़लक को ओढ़े

सलीम सिद्दीक़ी

तुझ को पाने के लिए ख़ुद से गुज़र तक जाऊँ

सलीम सिद्दीक़ी

इतनी क़ुर्बत भी नहीं ठीक है अब यार के साथ

सलीम सिद्दीक़ी

इक दरीचे की तमन्ना मुझे दूभर हुई है

सलीम सिद्दीक़ी

बड़ी ही अँधेरी डगर है मियाँ

सलीम शीराज़ी

बड़ी ही अँधेरी डगर है मियाँ

सलीम शीराज़ी

वहम ओ ख़िरद के मारे हैं शायद सब लोग

सलीम शहज़ाद

नहीं है कोई दूसरा मंज़र चारों ओर

सलीम शहज़ाद

हाँ कहीं जुगनू चमकता था चलो वापस चलो

सलीम शहज़ाद

उस को मिल कर देख शायद वो तिरा आईना हो

सलीम शाहिद

तर्ज़-ए-इज़हार में कोई तो नया-पन होता

सलीम शाहिद

क़ाइल करूँ किस बात से मैं तुझ को सितमगर

सलीम शाहिद

फिर कोई महशर उठाने मेरी तन्हाई में आ

सलीम शाहिद

मिरी थकन मिरे क़स्द-ए-सफ़र से ज़ाहिर है

सलीम शाहिद

मत पूछ कि इस पैकर-ए-ख़ुश-रंग में क्या है

सलीम शाहिद

मंज़र मिरी आँखों में रहे दश्त-ए-सफ़र के

सलीम शाहिद

क्या मेरा इख़्तियार ज़मान-ओ-मकान पर

सलीम शाहिद

इन दर-ओ-दीवार की आँखों से पट्टी खोल कर

सलीम शाहिद

हूँ मैं भी वही मेरा मुक़ाबिल भी वही है

सलीम शाहिद

दिल भर आए और अब्र-ए-दीदा में पानी न हो

सलीम शाहिद

दर्द की ख़ुश्बू से सारा घर मोअ'त्तर हो गया

सलीम शाहिद

अब्र सरका चाँद की चेहरा-नुमाई हो गई

सलीम शाहिद

तू ने ग़म ख़्वाह-मख़ाह उस का उठाया हुआ है

सलीम सरफ़राज़

सफ़र से आए तो फिर इक सफ़र नसीब हुआ

सलीम सरफ़राज़

अच्छा था कोई ख़्वाब नज़र में न पालते

सलीम सरफ़राज़

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