घर Poetry (page 46)

ज़लील-ओ-ख़्वार होती जा रही है

सलीम मुहीउद्दीन

अजनबी हैरान मत होना कि दर खुलता नहीं

सलीम कौसर

वो जो आए थे बहुत मंसब-ओ-जागीर के साथ

सलीम कौसर

तिलिस्म-ख़ाना-ए-अस्बाब मेरे सामने था

सलीम कौसर

फिर जी उठे हैं जिस से वो इम्कान तुम नहीं

सलीम कौसर

चश्म बे-ख़्वाब हुई शहर की वीरानी से

सलीम कौसर

चराग़-ए-याद की लौ हम-सफ़र कहाँ तक है

सलीम कौसर

अजनबी हैरान मत होना कि दर खुलता नहीं

सलीम कौसर

मशवरा

सलीम फ़िगार

मैं रात हव्वा

सलीम फ़िगार

आख़िरी पड़ाव

सलीम फ़िगार

वो तीरगी-ए-शब है कि घर लौट गए हैं

सलीम फ़राज़

सुहाने ख़्वाब आँखों में संजोना चाहता हूँ

सलीम फ़राज़

क्या लुत्फ़ हवाओं के सफ़र में नहीं रक्खा

सलीम फ़राज़

एक तो दुनिया का कारोबार है

सलीम फ़राज़

देख माज़ी के दरीचों को कभी खोला न कर

सलीम फ़राज़

अच्छा था कोई ख़्वाब नज़र में न पालते

सलीम फ़राज़

पड़ा हुआ मैं किसी आइने के घर में हूँ

सलीम बेताब

जी में आता है कि इक रोज़ ये मंज़र देखें

सलीम बेताब

मैं ग़म को बसा रहा हूँ दिल में

सलीम अहमद

दर-ब-दर ठोकरें खाईं तो ये मालूम हुआ

सलीम अहमद

सफ़र

सलीम अहमद

नींद से पहले

सलीम अहमद

नया मकान

सलीम अहमद

मशरिक़ हार गया

सलीम अहमद

खेल

सलीम अहमद

एक दरवाज़े पर

सलीम अहमद

दिया

सलीम अहमद

मिला जो काम ग़म-ए-मो'तबर बनाने का

सलीम अहमद

मैं उस को भूल गया था वो याद सा आया

सलीम अहमद

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