घर Poetry (page 47)

मैं सर छुपाऊँ कहाँ साया-ए-नज़र के बग़ैर

सलीम अहमद

ख़ैर का तुझ को यक़ीं है और उस को शर का है

सलीम अहमद

दुख दे या रुस्वाई दे

सलीम अहमद

दिलों में दर्द भरता आँख में गौहर बनाता हूँ

सलीम अहमद

दिल हुस्न को दान दे रहा हूँ

सलीम अहमद

देखने के लिए इक शर्त है मंज़र होना

सलीम अहमद

बन के दुनिया का तमाशा मो'तबर हो जाएँगे

सलीम अहमद

बजा ये रौनक़-ए-महफ़िल मगर कहाँ हैं वो लोग

सलीम अहमद

आँखों में सितारे से चमकते रहे ता-देर

सलीम अहमद

कटेगी कैसे गुल-ए-नौ की ज़िंदगी या-रब

सलाम संदेलवी

ऐ मिरे घर की फ़ज़ाओं से गुरेज़ाँ महताब

सलाम मछली शहरी

सड़क बन रही है

सलाम मछली शहरी

बहुत दिनों की बात है....

सलाम मछली शहरी

शगुफ़्ता बच्चों का चेहरा दिखाई देने लगे

सलाम मछली शहरी

न मौज-ए-बादा न ज़ुल्फ़ों न इन घटाओं ने

सलाम मछली शहरी

मैं तो कहता हूँ तुम्ही दर्द के दरमाँ हो ज़रूर

सलाम मछली शहरी

इन ग़ज़ालान-ए-तरह-दार को कैसे छोड़ूँ

सलाम मछली शहरी

रात कई दिनों से ग़ाएब थी

सलाहुद्दीन परवेज़

मिरी रात खो गई है किसी जागते बदन में

सलाहुद्दीन परवेज़

चैत

सलाहुद्दीन परवेज़

मता-ए-होश यहाँ सब ने बेच डाली है

सलाहुद्दीन नय्यर

हर एक ज़र्रा बार-ए-अमानत से डर गया

सलाहुद्दीन नय्यर

जिस के घर जाते न थे हज़रत-ए-दिल

सख़ी लख़नवी

जाएगी गुलशन तलक उस गुल की आमद की ख़बर

सख़ी लख़नवी

ये तो मालूम कि फिर आइएगा

सख़ी लख़नवी

'सख़ी' से छूट कर जाएँगे घर आप

सख़ी लख़नवी

रुख़ पर है मलाल आज कैसा

सख़ी लख़नवी

फिर उलझते हैं वो गेसू की तरह

सख़ी लख़नवी

है चमन में रहम गुलचीं को न कुछ सय्याद को

सख़ी लख़नवी

दुल्हन भी अगर बन के आएगी रात

सख़ी लख़नवी

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