गुबार Poetry (page 13)

हमारे साथ उमीद-ए-बहार तुम भी करो

फ़राग़ रोहवी

ये किस क़यामत की बेकसी है ज़मीं ही अपना न यार मेरा

फ़ानी बदायुनी

संग-ए-दर देख के सर याद आया

फ़ानी बदायुनी

बे-ख़ुदी पे था 'फ़ानी' कुछ न इख़्तियार अपना

फ़ानी बदायुनी

कोई नाम है न कोई निशाँ मुझे क्या हुआ

फ़ैज़ी

तन्हाई

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

मौज़ू-ए-सुख़न

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

ग़ुबार-ए-ख़ातिर-ए-महफ़िल ठहर जाए

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

सब्ज़ रुतों में क़दीम घरों की ख़ुशबू

फ़हीम शनास काज़मी

फैला अजब ग़ुबार है आईना-गाह में

एजाज़ गुल

पेचाक-ए-उम्र अपने सँवार आइने के साथ

एजाज़ गुल

कभी क़तार से बाहर कभी क़तार के बीच

एजाज़ गुल

तकमील

एजाज़ फ़ारूक़ी

जबीं की धूल जिगर की जलन छुपाएगा

एहसान दानिश

कुछ भी नहीं है ख़ाक के आज़ार से परे

दिलावर अली आज़र

ऐ इश्क़ तू ने वाक़िफ़-ए-मंज़िल बना दिया

दिल शाहजहाँपुरी

सारे नुक़ूश जिस पे तिरे आशियाँ के हैं

दिल अय्यूबी

ले दाम-ए-निगाह-ए-यार आया

दाऊद औरंगाबादी

राज़-ए-निहाँ थी ज़िंदगी राज़-ए-निहाँ है आज भी

दर्शन सिंह

मिट्टी था और दूध में गूँधा गया मुझे

दानियाल तरीर

पुकारती है ख़मोशी मिरी फ़ुग़ाँ की तरह

दाग़ देहलवी

मुझ सा न दे ज़माने को परवरदिगार दिल

दाग़ देहलवी

काबे की है हवस कभी कू-ए-बुताँ की है

दाग़ देहलवी

ग़ज़ब किया तिरे वअ'दे पे ए'तिबार किया

दाग़ देहलवी

हर आरज़ू में रंग है बाग़-ओ-बहार का

चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी

ख़ाक-ए-हिंद

चकबस्त ब्रिज नारायण

ख़्वाहिशों से वलवलों से दूर रहना चाहिए

भारत भूषण पन्त

क़यामत है जो ऐसे पर दिल-ए-उम्मीद-वार आए

बेख़ुद देहलवी

तेरा सितम जो मुझ से गदा ने सहा सहा

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

हज़ार कहता रहा मैं कि यार एक मिनट

बासिर सुल्तान काज़मी

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