पेचाक-ए-उम्र अपने सँवार आइने के साथ

पेचाक-ए-उम्र अपने सँवार आइने के साथ

बाक़ी के चार दिन भी गुज़ार आइने के साथ

हासिद बहुत है पल में हुवैदा करे ख़िज़ाँ

इतना न लग के बैठ बहार आइने के साथ

पथरा गए हैं लोग तजल्ली से हुस्न की

थोड़ा सा डाल रुख़ पे ग़ुबार आइने के साथ

करता है अक्स ज़ेर-ओ-ज़बर ना-मुराद वक़्त

जब घूमता है उल्टे मदार आइने के साथ

पाया न कुछ ख़ला के सिवा अक्स-ए-हैरती

गुज़रा था आर-पार हज़ार आइने के साथ

मादूम हो रहे हैं ख़द-ओ-ख़ाल किस सबब

गुफ़्त-ओ-शुनीद कर मिरे यार आइने के साथ

वीरान सा खंडर है मगर सैर के लिए

लगती है इक तवील क़तार आइने के साथ

माकूस ओ अक्स कैसे हैं पैवस्त देख तू

आईना कर रहा है सिंघार आइने के साथ

(990) Peoples Rate This


Fatal error: Uncaught PDOException: SQLSTATE[42S22]: Column not found: 1054 Unknown column 'id' in 'ORDER BY' in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php:554 Stack trace: #0 /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php(554): PDOStatement->execute() #1 {main} thrown in /home/darsaal/htdocs/darsaal.com/poetry/poem_hi.php on line 554