यार Poetry

सर पर किसी ग़रीब के नाचार गिर पड़े

ग़ुलाम हुसैन साजिद

शबाब आ गया उस पर शबाब से पहले

ए जी जोश

रोए भगत कबीर

हबीब जालिब

'मजाज़' की मौत पर

द्वारका दास शोला

तस्वीर तेरी यूँ ही रहे काश जेब में

आमिर अमीर

दिल से अरमाँ निकल रहे हैं

अख़्तर सईद

जब जब मैं ज़िंदगी की परेशानियों में था

मैं किस से पूछता कि भला क्या कमी हुई

नईम गिलानी

दुखती है रूह पाँव को लाचार देख कर

बिमल कृष्ण अश्क

कई लम्हे

फ़ैसल हाश्मी

ज़ाबता

हबीब जालिब

तेरी नज़रों से यार उतर जाऊँ

जब जब मैं ज़िंदगी की परेशानियों में था

ले के दिल कहते हो उल्फ़त क्या है

फ़ुग़ाँ के साथ तिरे राहत-ए-क़रार चले

टेक लगा कर बैठा हूँ मैं जिस बूढ़ी दीवार के साथ

ज़ुल्फ़िकार नक़वी

सदियों के बाद होश में जो आ रहा हूँ मैं

ज़ुल्फ़िकार नक़वी

कातता हूँ रात-भर अपने लहू की धार को

ज़ुल्फ़िक़ार अहमद ताबिश

ये मेज़ ये किताब ये दीवार और मैं

ज़ुल्फ़िक़ार आदिल

मेरे गिर्या से न आज़ार उठाने से हुआ

ज़िया-उल-मुस्तफ़ा तुर्क

कूचा-ए-यार में मैं ने जो जबीं-साई की

ज़ियाउल हक़ क़ासमी

जिस तरह प्यासा कोई आब-ए-रवाँ तक पहुँचे

ज़िया ज़मीर

इश्क़ जब तुझ से हुआ ज़ेहन के जुगनू जागे

ज़िया ज़मीर

तिरी निगह से इसे भी गुमाँ हुआ कि मैं हूँ

ज़िया जालंधरी

ख़ून के दरिया बह जाते हैं ख़ैर और ख़ैर के बीच

ज़िया जालंधरी

दिल बुझने लगा आतिश-ए-रुख़्सार के होते

ज़ेहरा निगाह

रुक जा हुजूम-ए-गुल कि अभी हौसला नहीं

ज़ेहरा निगाह

दिल बुझने लगा आतिश-ए-रुख़्सार के होते

ज़ेहरा निगाह

अब तक शरीक-ए-महफ़िल-ए-अग़्यार कौन है

ज़ेहरा निगाह

फूलों की अंजुमन में बहुत देर तक रहा

ज़ीशान साहिल

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