गुल Poetry (page 10)
जा बैठते हो ग़ैरों में ग़ैरत नहीं आती
वाजिद अली शाह अख़्तर
गर्मियाँ शोख़ियाँ किस शान से हम देखते हैं
वाजिद अली शाह अख़्तर
कौन ये रौशनी को समझाए
वजद चुगताई
आप ही अपना मैं दुश्मन हो गया
वजद चुगताई
तीर-ए-नज़र ने ज़ुल्म को एहसाँ बना दिया
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
तिरे आशुफ़्ता से क्या हाल-ए-बेताबी बयाँ होगा
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
नहीं कि इश्क़ नहीं है गुल ओ समन से मुझे
वहशत रज़ा अली कलकत्वी
ज़िंदगी
वहीदुद्दीन सलीम
आरियों की पहली आमद हिन्दोस्तान में
वहीदुद्दीन सलीम
रौशन हों दिल के दाग़ तो लब पर फ़ुग़ाँ कहाँ
वहीदा नसीम
ग़म के हाथों शुक्र-ए-ख़ुदा है इश्क़ का चर्चा आम नहीं
वहीद क़ुरैशी
परोमीथियस
वहीद अख़्तर
पत्थरों का मुग़न्नी
वहीद अख़्तर
उम्र को करती हैं पामाल बराबर यादें
वहीद अख़्तर
क्यूँ तिरी क़ंद-लबी ख़ुश-सुख़नी याद आई
वहीद अख़्तर
ख़ुश्बू है कभी गुल है कभी शम्अ कभी है
वहीद अख़्तर
कतरा के गुल्सिताँ से जो सू-ए-क़फ़स चले
वहीद अख़्तर
हम ने देखा है मोहब्बत का सज़ा हो जाना
वहीद अख़्तर
आँख जो नम हो वही दीदा-ए-तर मेरा है
वहीद अख़्तर
थकावटों से बैठ के सफ़र उतारिए कहीं
वहाब दानिश
उम्र-भर उस की निशानी देखिए
विनीत आश्ना
खोए हुए सहरा तक ऐ बाद-ए-सबा जाना
वारिस किरमानी
ऐ सबा निकहत-ए-गेसू-ए-मुअंबर लाना
वारिस किरमानी
हवा-ए-शोख़ की आख़िर फ़ुसूँ कारी ये कैसी है
वली मदनी
घटाएँ ऊदी ऊदी मै-कदा बर-दोश-ए-फ़स्ल-ए-गुल
वहशी कानपुरी
किसे बताऊँ कि ग़म क्या है सरख़ुशी क्या है
उरूज ज़ैदी बदायूनी
सबा से आती है कुछ बू-ए-आश्ना मुझ को
उर्फ़ी आफ़ाक़ी
तअ'स्सुब की फ़ज़ा में ता'ना-ए-किरदार क्या देता
उनवान चिश्ती
हुस्न से आँख लड़ी हो जैसे
उनवान चिश्ती
थम ज़रा वक़्त-ए-अजल दीदार-ए-जाँ होने लगा
उम्मीद ख़्वाजा
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