गुल Poetry (page 18)

रंग लाया दिवाना-पन मेरा

सिकंदर अली वज्द

कैफ़ जो रूह पे तारी है तुझे क्या मालूम

सिकंदर अली वज्द

होश ओ ख़िरद से बेगाना बन जा

सिकंदर अली वज्द

हसीं यादों से ख़ल्वत अंजुमन है

सिकंदर अली वज्द

मिरे चेहरे से ग़म आँखों से हैरानी न जाएगी

सिद्दीक़ मुजीबी

दिल-ए-आईना-सामाँ पारा पारा कर के देखा जाए

सिद्दीक़ मुजीबी

गीत ख़ुशी का गाओ

सिद्दीक़ कलीम

हर चंद कि प्यारा था मैं सूरज की नज़र का

सिद्दीक़ अफ़ग़ानी

ग़ाज़ा तो तिरा उतर गया था

सिद्दीक़ अफ़ग़ानी

शौक़-ए-आवारा यूँही ख़ाक-बसर जाएगा

सिद्दीक़ शाहिद

शहर सहरा है घर बयाबाँ है

सिद्दीक़ शाहिद

न देखा जामा-ए-ख़ुद-रफ़्तगी उतार के भी

सिद्दीक़ शाहिद

फ़ुग़ान-ए-रूह कोई किस तरह सुनाए उसे

सिद्दीक़ शाहिद

आग को फूल कहे जाएँ ख़िर्द-मंद अपने

सिद्दीक़ शाहिद

मिरे दिल की अब ऐ अश्क-ए-नदामत शुस्त-ओ-शू कर दे

श्याम सुंदर लाल बर्क़

हिज्र ग़म का बयान है गोया

श्याम सुंदर लाल बर्क़

तुझ तक गुज़र किसी का ऐ गुल-बदन न देखा

शऊर बलगिरामी

जाता है यार सैर को गुलज़ार की तरफ़

शऊर बलगिरामी

दिल फड़क जाएगा वो शोख़ जो ख़ंदाँ होगा

शऊर बलगिरामी

अर्ज़-ए-अहवाल-ए-दिल-ए-ज़ार करूँ या न करूँ

शऊर बलगिरामी

मैं किसी की रात का तन्हा चराग़

शुमाइला बहज़ाद

लतीफ़ ऐसी कुछ इस दिल की शीशा-कारी थी

शुजाअत अली राही

तभी आएगी लबों पर मिरे दिल की बात खुल के

शुजा ख़ावर

पार उतरने के लिए तो ख़ैर बिल्कुल चाहिए

शुजा ख़ावर

मैं ने सिर्फ़ अपने नशेमन को सजाया साल भर

शुजा ख़ावर

दश्त को जा तो रहे हो सोच लो कैसा लगेगा

शुजा ख़ावर

हिज्र ओ विसाल

शोरिश काश्मीरी

सुरमई रातों से छिनवा कर सहर की रौनक़ें

शोरिश काश्मीरी

हुस्न जब क़ातिल न था और इश्क़ दीवाना न था

शोला हस्पानवी

साँस की आस निगहबाँ है ख़बर-दार रहो

शोहरत बुख़ारी

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