गुलिस्ताँ Poetry (page 12)

ये रुख़-ए-यार नहीं ज़ुल्फ़-ए-परेशाँ के तले

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

बीसवीं सदी के हम शाइ'र-ए-परेशाँ हैं

बनो ताहिरा सईद

जब कि पहलू में हमारे बुत-ए-ख़ुद-काम न हो

ज़फ़र

उन्हें मुझ से शिकायत है

अज़रा नक़वी

दिल आया इस तरह आख़िर फ़रे‌‌‌‌ब-ए-साज़-ओ-सामाँ में

अज़ीज़ लखनवी

कुछ भी हो मिरा हाल नुमायाँ तो नहीं है

अज़ीम मुर्तज़ा

शौक़-ए-गुरेज़ाँ

असरार-उल-हक़ मजाज़

पर्दा और इस्मत

असरार-उल-हक़ मजाज़

किस से मोहब्बत है

असरार-उल-हक़ मजाज़

इशरत-ए-तन्हाई

असरार-उल-हक़ मजाज़

फ़िक्र

असरार-उल-हक़ मजाज़

एक जिला-वतन की वापसी

असरार-उल-हक़ मजाज़

एक ग़मगीन याद

असरार-उल-हक़ मजाज़

अयादत

असरार-उल-हक़ मजाज़

आज की रात

असरार-उल-हक़ मजाज़

आओ अब मिल के गुलिस्ताँ को गुल्सिताँ कर दें

असरार-उल-हक़ मजाज़

ज़िंदगी उलझी है बिखरे हुए गेसू की तरह

असरा रिज़वी

तीर-ए-नज़र ने आप की घाएल किया मुझे

अशहद बिलाल इब्न-ए-चमन

यूँ मुस्कुराए जान सी कलियों में पड़ गई

असग़र गोंडवी

रूदाद-ए-चमन सुनता हूँ इस तरह क़फ़स में

असग़र गोंडवी

आरिज़-ए-नाज़ुक पे उन के रंग सा कुछ आ गया

असग़र गोंडवी

ज़ौक़-ए-सरमस्ती को महव-ए-रू-ए-जानाँ कर दिया

असग़र गोंडवी

ये इश्क़ ने देखा है ये अक़्ल से पिन्हाँ है

असग़र गोंडवी

मस्ती में फ़रोग़-ए-रुख़-ए-जानाँ नहीं देखा

असग़र गोंडवी

आलाम-ए-रोज़गार को आसाँ बना दिया

असग़र गोंडवी

सिर्फ़ कहने को कोई अज़्मत-निशाँ बनता नहीं

असद जाफ़री

अज़ल के दिन जिन्हें देखा था बज़्म-ए-हुस्न-ए-पिन्हाँ में

आरज़ू सहारनपुरी

नहीं चमके ये हँसने में तुम्हारे दाँत अंजुम से

अरशद अली ख़ान क़लक़

जुनूँ बरसाए पत्थर आसमाँ ने मज़रा-ए-जाँ पर

अरशद अली ख़ान क़लक़

मेरे प्यारे वतन

अर्श मलसियानी

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