हाल Poetry (page 20)
नज़र नज़र बे-क़रार सी है नफ़स नफ़स में शरार सा है
साग़र सिद्दीक़ी
कलियों की महक होता तारों की ज़िया होता
साग़र सिद्दीक़ी
आहन की सुर्ख़ ताल पे हम रक़्स कर गए
साग़र सिद्दीक़ी
हम आँखों से भी अर्ज़-ए-तमन्ना नहीं करते
साग़र निज़ामी
रोटी कपड़ा और मकान
साग़र ख़य्यामी
पस-ए-रौशनी
साग़र ख़य्यामी
इक्कीसवीं सदी का आदमी
साग़र ख़य्यामी
रात के अँधेरों को रौशनी वो क्या देगा
साग़र आज़मी
देखे बग़ैर हाल ये है इज़्तिराब का
सफ़ी लखनवी
सूने ही रहे हिज्र के सहरा उसे कहना
सफ़दर सलीम सियाल
दुरुस्त है कि मिरा हाल अब ज़ुबूँ भी नहीं
सफ़दर मीर
नज़र में रंग समाए हुए उसी के हैं
सईद क़ैस
चाहे हमारा ज़िक्र किसी भी ज़बाँ में हो
सईद नक़वी
क्यूँ भटकती सहरा में घर भी इक ख़राबा था
सादिया रोशन सिद्दीक़ी
नज़र नज़र से वो कलियाँ खिला खिला भी गया
सादिक़ नसीम
किस मुँह से ज़िंदगी को वो रख़्शंदा कह सकें
सादिक़ नसीम
जिस्म पर खुरदुरी सी छाल उगा
सादिक़
लफ़्ज़ों को सजा कर जो कहानी लिखना
सदफ़ जाफ़री
लाख तक़दीर पे रोए कोई रोने वाला
सदा अम्बालवी
इक चेहरे पर रोज़ गुज़ारा होता है
सचिन शालिनी
उस से बिछड़ के एक उसी का हाल नहीं मैं जान सका
साबिर ज़फ़र
नए कपड़े बदल और बाल बना तिरे चाहने वाले और भी हैं
साबिर ज़फ़र
मोहब्बतें थीं कुछ ऐसी विसाल हो के रहा
साबिर ज़फ़र
मिसाल-ए-संग पड़ा कब तक इंतिज़ार करूँ
साबिर ज़फ़र
मिरे ध्यान में है इक महल कहीं चौबारों का
साबिर वसीम
ख़्वाब तुम्हारे आते हैं
साबिर वसीम
देखो ऐसा अजब मुसाफ़िर फिर कब लौट के आता है
साबिर वसीम
हैरान हूँ दो आँखों से क्या देख रहा हूँ
साबिर दत्त
दुरुस्त है कि ये दिन राएगाँ नहीं गुज़रे
सबिहा सबा, न्यूयार्क
कब तक यक़ीन इश्क़ हमें ख़ुद न आएगा
सबा अकबराबादी
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