हाथ Poetry (page 21)

ये इक शजर कि जिस पे न काँटा न फूल है

शहरयार

हम पढ़ रहे थे ख़्वाब के पुर्ज़ों को जोड़ के

शहरयार

समुंदर तिश्नगी वहशत रसाई चश्मा-ए-लब तक

शहराम सर्मदी

हमारे ज़ेहन में ये बात भी नहीं आई

शहराम सर्मदी

बरसात का उधर है दिमाग़ आसमान पर

शहूद आलम आफ़ाक़ी

किसी से हाथ किसी से नज़र मिलाते हुए

शहनाज़ नूर

कभी जो मारका ख़्वाबों से रत-जगों का हुआ

शहनाज़ नूर

मर्द---औरत

शहनाज़ नबी

इंसाफ़

शहनाज़ नबी

तेरी तख़्लीक़ तिरा रंग हवाला था मिरा

शहनवाज़ ज़ैदी

हर किसी ख़्वाब के चेहरे पे लिखूँ नाम तिरा

शहनवाज़ ज़ैदी

सानेहा हो के रहा चश्म का मुरझा जाना

शाहिदा हसन

कोई तारा न दिखा शाम की वीरानी में

शाहिदा हसन

जब घर ही जुदा जुदा रहेगा

शाहिदा हसन

जिधर भी देखिए इक रास्ता बना हुआ है

शाहिद ज़की

वार हुआ कुछ इतना गहरा पानी का

शाहिद मीर

न जाने क्या हुए अतराफ़ देखने वाले

शाहिद मीर

इक सब्ज़ रंग बाग़ दिखाया गया मुझे

शाहिद मीर

अजीब लोग

शाहिद माहुली

ये जो रब्त रू-ब-ज़वाल है ये सवाल है

शाहिद लतीफ़

सोचता है किस लिए तू मेरे यार दे मुझे

शाहिद कमाल

शिकस्ता जिस्म दरीदा जबीन की जानिब

शाहिद कमाल

ग़मों की रात है और इतनी मुख़्तसर भी नहीं

शाहिद कमाल

धूप के ज़र्द जज़ीरों में नुमू ज़िंदा है

शाहिद कमाल

ब-हर्फ़-ए-सूरत इंकार तोड़ दी मैं ने

शाहिद कमाल

मैं इंतिहा-ए-यास में तन्हा खड़ा रहा

शाहिद कलीम

कोरे काग़ज़ पे मिरा नक़्श उतारे कोई

शाहिद कलीम

ज़मीं पे चल न सका आसमान से भी गया

शाहिद कबीर

तुम से मिलते ही बिछड़ने के वसीले हो गए

शाहिद कबीर

बे-सबब बात बढ़ाने की ज़रूरत क्या है

शाहिद कबीर

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