हुआ Poetry (page 226)

मैं सोचता हूँ अगर इस तरफ़ वो आ जाता

आफ़ताब हुसैन

किसी नज़र ने मुझे जाम पर लगाया हुआ है

आफ़ताब हुसैन

इस अँधेरे में जो थोड़ी रौशनी मौजूद है

आफ़ताब हुसैन

हर फूल है हवाओं के रुख़ पर खिला हुआ

आफ़ताब हुसैन

दे रहे हैं जिस को तोपों की सलामी आदमी

आफ़ताब हुसैन

अस्ल हालत का बयाँ ज़ाहिर के साँचों में नहीं

आफ़ताब हुसैन

आग़ाज़ हुआ है उल्फ़त का अब देखिए क्या क्या होना है

अफ़सर मेरठी

सरिश्क-ए-ग़म की रवानी थमी है मुश्किल से

अफ़सर माहपुरी

शम्स मादूम है तारों में ज़िया है तो सही

अफ़रोज़ आलम

शबनम की तरह सुब्ह की आँखों में पड़ा है

अफ़रोज़ आलम

मौज-दर-मौज हवाओं से बचा लाऊँगा

अफ़रोज़ आलम

जिगर को ख़ून किए दिल को बे-क़रार अभी

अफ़रोज़ आलम

गुज़रे लम्हात का एहसास हुआ जाता है

अफ़रोज़ आलम

बड़ा ख़ुशनुमा ये मक़ाम है नई ज़िंदगी की तलाश कर

अफ़रोज़ आलम

ऐ दोस्त तिरी बात सहर-ख़ेज़ बहुत है

अफ़रोज़ आलम

आप से उन्स हुआ चाहता है

अफ़रोज़ आलम

उस ने क्यूँ सब से जुदा मेरी पज़ीराई की

अफ़ीफ़ सिराज

बरसों के जैसे लम्हों में ये रात गुज़रती जाएगी

अफ़ीफ़ सिराज

अंदाज़-ए-नुमू कैसा अलमनाक निकाला

अफ़ीफ़ सिराज

जो बन-सँवर के वो इक माह-रू निकलता है

अादिल रशीद

जाने किस को ढूँडने दाख़िल हुआ है जिस्म में

आदिल मंसूरी

दरवाज़ा बंद देख के मेरे मकान का

आदिल मंसूरी

वक़्त की पीठ पर

आदिल मंसूरी

वालिद के इंतिक़ाल पर

आदिल मंसूरी

उफ़ुक़ की हथेली से सूरज न उभरे

आदिल मंसूरी

तिलिस्मी ग़ार का दरवाज़ा

आदिल मंसूरी

सियाह सायों की तिश्नगी में

आदिल मंसूरी

शुऊर नीली रुतूबतों में उलझ गया है

आदिल मंसूरी

सातवीं पिसली में पीली चाँदनी

आदिल मंसूरी

नज़्म

आदिल मंसूरी

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