हुआ Poetry (page 227)

नज़्म

आदिल मंसूरी

हश्र की सुब्ह दरख़्शाँ हो मक़ाम-ए-महमूद

आदिल मंसूरी

फ़ैज़

आदिल मंसूरी

एक नज़्म

आदिल मंसूरी

दर्द तंहाई की पस्ली से निकल कर आया

आदिल मंसूरी

ऐनक के शीशे पर

आदिल मंसूरी

आमीन

आदिल मंसूरी

ये फैलती शिकस्तगी एहसास की तरफ़

आदिल मंसूरी

वो तुम तक कैसे आता

आदिल मंसूरी

वो बरसात की शब वो पिछ्ला पहर

आदिल मंसूरी

पहलू के आर-पार गुज़रता हुआ सा हो

आदिल मंसूरी

कौन था वो ख़्वाब के मल्बूस में लिपटा हुआ

आदिल मंसूरी

जलने लगे ख़ला में हवाओं के नक़्श-ए-पा

आदिल मंसूरी

घूम रहा था एक शख़्स रात के ख़ारज़ार में

आदिल मंसूरी

दूर उफ़ुक़ के पार से आवाज़ के पर्वरदिगार

आदिल मंसूरी

दरवाज़ा बंद देख के मेरे मकान का

आदिल मंसूरी

चेहरे पे चमचमाती हुई धूप मर गई

आदिल मंसूरी

अब टूटने ही वाला है तन्हाई का हिसार

आदिल मंसूरी

दुम

आदिल लखनवी

बात जो तुझ से ज़बानी हो गई

आदिल हयात

उसी एक फ़र्द के वास्ते मिरे दिल में दर्द है किस लिए

अदीम हाशमी

तेरे लिए चले थे हम तेरे लिए ठहर गए

अदीम हाशमी

तमाम उम्र की तन्हाई की सज़ा दे कर

अदीम हाशमी

तअल्लुक़ अपनी जगह तुझ से बरक़रार भी है

अदीम हाशमी

शोर सा एक हर इक सम्त बपा लगता है

अदीम हाशमी

शामिल था ये सितम भी किसी के निसाब में

अदीम हाशमी

मुफ़ाहमत न सिखा जब्र-ए-नारवा से मुझे

अदीम हाशमी

मैं गुफ़्तुगू हूँ कि तहरीर के जहान में हूँ

अदीम हाशमी

क्यूँ मिरे लब पे वफ़ाओं का सवाल आ जाए

अदीम हाशमी

किस हवाले से मुझे किस का पता याद आया

अदीम हाशमी

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