हुआ Poetry (page 229)

सब की आँखों में जो समाया था

अबु मोहम्मद सहर

सब इक न इक सराब के चक्कर में रह गए

अबु मोहम्मद सहर

ख़्वाबों का नश्शा है न तमन्ना का सिलसिला

अबु मोहम्मद सहर

काम हर ज़ख़्म ने मरहम का किया हो जैसे

अबु मोहम्मद सहर

इश्क़ की सई-ए-बद-अंजाम से डर भी न सके

अबु मोहम्मद सहर

चाँद का रक़्स सितारों का फ़ुसूँ माँगती है

अबु मोहम्मद सहर

अब तक इलाज-ए-रंजिश-ए-बे-जा न कर सके

अबु मोहम्मद सहर

तीर-अंदाजों को अंदाज़ा नहीं

अबसार अब्दुल अली

तुम यूँ सियाह-चश्म ऐ सजन मुखड़े के झुमकों से हुए

आबरू शाह मुबारक

शेर को मज़मून सेती क़द्र हो है 'आबरू'

आबरू शाह मुबारक

मेहराब-ए-अबरुवाँ कूँ वसमा हुआ है ज़ेवर

आबरू शाह मुबारक

मालूम अब हुआ है आ हिन्द बीच हम कूँ

आबरू शाह मुबारक

मैं निबल तन्हा न इस दुनिया की सोहबत सीं हुआ

आबरू शाह मुबारक

कम मत गिनो ये बख़्त-सियाहों का रंग-ए-ज़र्द

आबरू शाह मुबारक

जब सीं तिरे मुलाएम गालों में दिल धँसा है

आबरू शाह मुबारक

ग़म सीं अहल-ए-बैत के जी तो तिरा कुढ़ता नहीं

आबरू शाह मुबारक

अब दीन हुआ ज़माना-साज़ी

आबरू शाह मुबारक

ये बाव क्या फिरी कि तिरी लट पलट गई

आबरू शाह मुबारक

याद-ए-ख़ुदा कर बंदे यूँ नाहक़ उम्र कूँ खोना क्या

आबरू शाह मुबारक

तुम्हारे लोग कहते हैं कमर है

आबरू शाह मुबारक

तूफ़ाँ है शैख़ क़हरिया है

आबरू शाह मुबारक

तीरा-रंगों के हुआ हक़ में ये तप करना दवा

आबरू शाह मुबारक

शब-ए-सियाह हुआ रोज़ ऐ सजन तुझ बिन

आबरू शाह मुबारक

सरसों लगा के पाँव तलक दिल हुआ हूँ मैं

आबरू शाह मुबारक

सैर-ए-बहार-ए-हुस्न ही अँखियों का काम जान

आबरू शाह मुबारक

रता है अबरुवाँ पर हाथ अक्सर लावबाली का

आबरू शाह मुबारक

पलंग कूँ छोड़ ख़ाली गोद सीं जब उठ गया मीता

आबरू शाह मुबारक

निगह तेरी का इक ज़ख़्मी न तन्हा दिल हमारा है

आबरू शाह मुबारक

नालाँ हुआ है जल कर सीने में मन हमारा

आबरू शाह मुबारक

मगर तुम सीं हुआ है आश्ना दिल

आबरू शाह मुबारक

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