हुआ Poetry (page 230)

क्यूँ बंद सब खुले हैं क्यूँ चीर अटपटा है

आबरू शाह मुबारक

कोयल नीं आ के कोक सुनाई बसंत रुत

आबरू शाह मुबारक

ख़ुर्शीद-रू के आगे हो नूर का सवाली

आबरू शाह मुबारक

कमाँ हुआ है क़द अबरू के गोशा-गीरों का

आबरू शाह मुबारक

जलते हैं और हम सीं जब माँगते हो प्याला

आबरू शाह मुबारक

इश्क़ है इख़्तियार का दुश्मन

आबरू शाह मुबारक

इंसान है तो किब्र सीं कहता है क्यूँ अना

आबरू शाह मुबारक

हम नीं सजन सुना है उस शोख़ के दहाँ है

आबरू शाह मुबारक

है हमन का शाम कोई ले जा

आबरू शाह मुबारक

गुनाहगारों की उज़्र-ख़्वाही हमारे साहिब क़ुबूल कीजे

आबरू शाह मुबारक

दिल नीं पकड़ी है यार की सूरत

आबरू शाह मुबारक

देखो तो जान तुम कूँ मनाते हैं कब सेती

आबरू शाह मुबारक

आया है सुब्ह नींद सूँ उठ रसमसा हुआ

आबरू शाह मुबारक

नई हवा में कोई रंग-ए-काएनात में गुम

अबरार किरतपुरी

शाम से मिलने गया तो रात ने ठहरा लिया

अबरार हामिद

क्या क्या धरे अजूबे हैं शहर-ए-ख़याल में

अबरार हामिद

ख़ुश-बख़्त हैं आज़ाद हैं जो अपने सुख़न में

अबरार हामिद

मैं ने कल तोड़ा इक आईना तो महसूस हुआ

अबरार आज़मी

गुम-शुदा

अबरार आज़मी

उस ने कल भागते लम्हों को पकड़ रक्खा था

अबरार आज़मी

तन्हा उदास शब के सिवा कोई भी न था

अबरार आज़मी

ख़याल लम्स का कार-ए-सवाब जैसा था

अबरार आज़मी

गो फ़रामोशी की तकमील हुआ चाहती है

अबरार अहमद

ज़िंदा आदमी से कलाम

अबरार अहमद

तुम जो आते हो

अबरार अहमद

तिरी दुनिया के नक़्शे में

अबरार अहमद

क़स्बाती लड़कों का गीत

अबरार अहमद

पिछले पहर की दस्तक

अबरार अहमद

पस-मंज़र की आवाज़

अबरार अहमद

मौत दिल से लिपट गई उस शब

अबरार अहमद

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