हुआ Poetry (page 232)

किसे ख़बर थी कि ख़ुद को वो यूँ छुपाएगा

आबिद ख़ुर्शीद

इल्तिजा है इज्ज़-ओ-उसरत कुन-फ़कानी और है

आबिद काज़मी

मिरा बदन है मगर मुझ से अजनबी है अभी

आबिद आलमी

किसी मक़ाम पे हम को भी रोकता कोई

आबिद आलमी

जब से अल्फ़ाज़ के जंगल में घिरा है कोई

आबिद आलमी

जब भी कमरे में कुछ हवा आई

आबिद आलमी

दे गया आख़िरी सदा कोई

आबिद आलमी

जो अपने आप को सब कुछ समझ ले

आबिद अख़्तर

अपनी कमी से पूछ न उस की कमी से पूछ

आबिद अख़्तर

तेरी आँखों के लिए इतनी सज़ा काफ़ी है

अभिषेक शुक्ला

मैं चोट कर तो रहा हूँ हवा के माथे पर

अभिषेक शुक्ला

सुर्ख़ सहर से है तो बस इतना सा गिला हम लोगों का

अभिषेक शुक्ला

ख़ला के जैसा कोई दरमियान भी पड़ता

अभिषेक शुक्ला

हम ऐसे सोए भी कब थे हमें जगा लाते

अभिषेक शुक्ला

दर-ए-ख़याल भी खोलें सियाह शब भी करें

अभिषेक शुक्ला

चलते हुए मुझ में कहीं ठहरा हुआ तू है

अभिषेक शुक्ला

अभी तो आप ही हाइल है रास्ता शब का

अभिषेक शुक्ला

अब इख़्तियार में मौजें न ये रवानी है

अभिषेक शुक्ला

राह भटका हुआ इंसान नज़र आता है

अभिषेक कुमार अम्बर

सितारों से आगे जहाँ और भी हैं

अबीर अबुज़री

वही क़ातिल वही मुंसिफ़ बना है

अब्दुस्समद ’तपिश’

जहाँ तक पाँव मेरे जा सके हैं

अब्दुस्समद ’तपिश’

पत्ते पत्ते से नग़्मा-सरा कौन है

अब्दुस्समद ’तपिश’

देख कर मेरी अना किस दर्जा हैरानी में है

अब्दुस्समद ’तपिश’

अगर वो बे-अदब है बे-अदब लिख

अब्दुस्समद ’तपिश’

अभी तक हौसला ठहरा हुआ है

अब्दुस्समद ’तपिश’

आँख थी सूजी हुई और रात भर सोया न था

अब्दुस्समद ’तपिश’

मेज़ क़लम क़िर्तास दरीचा सन्नाटा

अब्दुर्राहमान वासिफ़

मज़ीद कुछ नहीं बोला मैं हो गया ख़ामोश

अब्दुर्राहमान वासिफ़

जहान-ए-फ़िक्र पे चमकेगा जब सितारा मिरा

अब्दुर्राहमान वासिफ़

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