प्रेम Poetry (page 35)

कोई याद ही रख़्त-ए-सफ़र ठहरे कोई राहगुज़र अनजानी हो

सलीम कौसर

कैसे हंगामा-ए-फ़ुर्सत में मिले हैं तुझ से

सलीम कौसर

कभी सितारे कभी कहकशाँ बुलाता है

सलीम कौसर

इस आलम-ए-हैरत-ओ-इबरत में कुछ भी तो सराब नहीं होता

सलीम कौसर

सफ़र में इश्क़ के इक ऐसा मरहला आया

सलीम अहमद

रस्म-ए-जहाँ न छूट सकी तर्क-ए-इश्क़ से

सलीम अहमद

मैं वो मअ'नी-ए-ग़म-ए-इश्क़ हूँ जिसे हर्फ़ हर्फ़ लिखा गया

सलीम अहमद

ये ख़्वाब और भी देखेंगे रात बाक़ी है

सलीम अहमद

तर्क उन से रस्म-ओ-राह-ए-मुलाक़ात हो गई

सलीम अहमद

'सलीम' दश्त-ए-तमन्ना में कौन है किस का

सलीम अहमद

न पूछो अक़्ल की चर्बी चढ़ी है उस की बोटी पर

सलीम अहमद

मुझ को दुश्वार हुआ जिस का नज़ारा तन्हा

सलीम अहमद

मैं उस को भूल गया था वो याद सा आया

सलीम अहमद

लम्हा-ए-रफ़्ता का दिल में ज़ख़्म सा बन जाएगा

सलीम अहमद

कोई सितारा-ए-गिर्दाब आश्ना था मैं

सलीम अहमद

किसी दश्त का लब-ए-ख़ुश्क हूँ जो न पाए मुज़्दा-ए-आब तक

सलीम अहमद

कल नशात-ए-क़ुर्ब से मौसम बहार-अंदाज़ा था

सलीम अहमद

इश्क़ और नंग-ए-आरज़ू से आर

सलीम अहमद

हर आँख का हासिल दूरी है

सलीम अहमद

अहल-ए-दिल ने इश्क़ में चाहा था जैसा हो गया

सलीम अहमद

ताबानी-ए-रुख़ ले कर तुम सामने जब आए

सलाम संदेलवी

ये धरती ख़ूब-सूरत है

सलाम मछली शहरी

जीतेंगे न हम से बाज़ी-ए-इश्क़

सख़ी लख़नवी

फिर उलझते हैं वो गेसू की तरह

सख़ी लख़नवी

निस्बत वही माह-ए-आसमाँ से

सख़ी लख़नवी

इश्क़ है यार का ख़ुदा-हाफ़िज़

सख़ी लख़नवी

इन को नफ़रत इसे क्या कहते हैं

सख़ी लख़नवी

सितम तू करता है लेकिन दुआ भी देता है

सज्जाद सय्यद

ज़बाँ को ज़ाइका-ए-शेर-ए-तर नहीं मिलता

सज्जाद बाक़र रिज़वी

तेरे शैदा भी हुए इश्क़-ए-तमाशा भी हुए

सज्जाद बाक़र रिज़वी

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