प्रेम Poetry (page 97)

एक ही अंजाम है ऐ दोस्त हुस्न ओ इश्क़ का

अख़तर मुस्लिमी

न समझ सकी जो दुनिया ये ज़बान-ए-बे-ज़बानी

अख़तर मुस्लिमी

माइल-ए-लुत्फ़ है आमादा-ए-बे-दाद भी है

अख़तर मुस्लिमी

कहाँ जाएँ छोड़ के हम उसे कोई और उस के सिवा भी है

अख़तर मुस्लिमी

दिल ही रह-ए-तलब में न खोना पड़ा मुझे

अख़तर मुस्लिमी

ज़िंदगी होगी मिरी ऐ ग़म-ए-दौराँ इक रोज़

अख़्तर अंसारी अकबराबादी

नहीं आसान तर्क-ए-इश्क़ करना दिल से ग़म जाना

अख़्तर अंसारी अकबराबादी

लुटाओ जान तो बनती है बात किस ने कहा

अख़्तर अंसारी अकबराबादी

हर लम्हा अता करता है पैमाना सा इक शख़्स

अख़्तर अंसारी अकबराबादी

हाँ कभी ख़्वाब-ए-इश्क़ देखा था

अख़्तर अंसारी

मेरे रुख़ से सुकूँ टपकता है

अख़्तर अंसारी

हर वक़्त नौहा-ख़्वाँ सी रहती हैं मेरी आँखें

अख़्तर अंसारी

दिन मुरादों के ऐश की रातें

अख़्तर अंसारी

बहार-ए-फ़िक्र के जल्वे लुटा दिए हम ने

अख़्तर अंसारी

अपनी उजड़ी हुई दुनिया की कहानी हूँ मैं

अख़्तर अंसारी

अपनी बहार पे हँसने वालो कितने चमन ख़ाशाक हुए

अख़्तर अंसारी

तवील-तर है सफ़र मुख़्तसर नहीं होता

अख़्तर अमान

पहले हम इश्क़ किया करते थे

अख़्तर अमान

वो हज़ार हम पे जफ़ा सही कोई शिकवा फिर भी रवा नहीं

अख़गर मुशताक़ रहीमाबादी

जुनून-ए-इश्क़ का जो कुछ हुआ अंजाम क्या कहिए

अख़गर मुशताक़ रहीमाबादी

कुल आलम-ए-वुजूद कि इक दश्त-ए-नूर था

अकबर हैदराबादी

जिन के नसीब में आब-ओ-दाना कम कम होता है

अकबर हैदराबादी

काफ़िर था मैं ख़ुदा का न मुंकिर दुआ का था

अकबर हमीदी

किस चमन की ख़ाक में फूलों का मुस्तक़बिल नहीं

अकबर हैदरी

हर नफ़स मिन्नत-कश-ए-आलाम है

अकबर हैदरी

मेरे हवास इश्क़ में क्या कम हैं मुंतशिर

अकबर इलाहाबादी

अब तो है इश्क़-ए-बुताँ में ज़िंदगानी का मज़ा

अकबर इलाहाबादी

तिरी ज़ुल्फ़ों में दिल उलझा हुआ है

अकबर इलाहाबादी

तरीक़-ए-इश्क़ में मुझ को कोई कामिल नहीं मिलता

अकबर इलाहाबादी

न बहते अश्क तो तासीर में सिवा होते

अकबर इलाहाबादी

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