प्रेम Poetry (page 95)

आँख कुछ बे-सबब ही नम तो नहीं

अली जव्वाद ज़ैदी

फ़रेब-ए-जल्वा कहाँ तक ब-रू-ए-कार रहे

अली अख़्तर अख़्तर

मुझे तो इंतिज़ार-ए-इश्क़ में ही लुत्फ़ आता है

अलीना इतरत

पुकारते पुकारते सदा ही और हो गई

अलीना इतरत

वो अर्ज़-ए-ग़म पे मश्वरा-ए-इख़्तिसार दे

अलीम उस्मानी

देती हैं थपकियाँ तिरी परछाइयाँ मुझे

अलीम उस्मानी

वो क्या गए पयाम-ए-सफ़र दे गए मुझे

अलीम अख़्तर

तू अगर दिल-नवाज़ हो जाए

अलीम अख़्तर

मा-सिवा-ए-कार-ए-आह-ओ-अश्क क्या है इश्क़ में

आलमताब तिश्ना

हम अपने इश्क़ की अब और क्या शहादत दें

आलमताब तिश्ना

उठते हुए तूफ़ान का मंज़र नहीं देखा

आलमताब तिश्ना

सफ़र में राह के आशोब से न डर जाना

आलमताब तिश्ना

सफ़र में राह के आशोब से न डर जाना

आलमताब तिश्ना

मिरी दस्तरस में है गर क़लम मुझे हुस्न-ए-फ़िक्र-ओ-ख़याल दे

आलमताब तिश्ना

मैं अपनी जंग में तन-ए-तन्हा शरीक था

आलमताब तिश्ना

किस किस से दोस्ती हुई ये ध्यान में नहीं

आलमताब तिश्ना

दर्द की इक लहर बल खाती है यूँ दिल के क़रीब

आलमताब तिश्ना

अब भी ज़र्रों पे सितारों का गुमाँ है कि नहीं

आलमताब तिश्ना

आइना-ख़ाना भी अंदोह-ए-तमन्ना निकला

आलमताब तिश्ना

सियाह रात के बदन पे दाग़ बन के रह गए

आलम ख़ुर्शीद

कोई सुनता ही नहीं किस को सुनाने लग जाएँ

अकरम नक़्क़ाश

प्यार इश्क़ हमदर्दी और दोस्ती साज़िश

अकमल इमाम

यादें

अख़्तर-उल-ईमान

तर्ग़ीब और उस के ब'अद

अख़्तर-उल-ईमान

सब्ज़ा-ए-बेगाना

अख़्तर-उल-ईमान

आख़िरी मुलाक़ात

अख़्तर-उल-ईमान

ज़रा सी देर थी बस इक दिया जलाना था

अख्तर शुमार

लॉन्ड्री खोली थी उस के इश्क़ में

अख़्तर शीरानी

वक़्त की क़द्र

अख़्तर शीरानी

ओ देस से आने वाले बता

अख़्तर शीरानी

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