जान Poetry (page 45)

उज़्र उन की ज़बान से निकला

दाग़ देहलवी

उज़्र आने में भी है और बुलाते भी नहीं

दाग़ देहलवी

उस के दर तक किसे रसाई है

दाग़ देहलवी

साफ़ कब इम्तिहान लेते हैं

दाग़ देहलवी

फिरे राह से वो यहाँ आते आते

दाग़ देहलवी

निगाह-ए-शोख़ जब उस से लड़ी है

दाग़ देहलवी

ले चला जान मिरी रूठ के जाना तेरा

दाग़ देहलवी

खुलता नहीं है राज़ हमारे बयान से

दाग़ देहलवी

ख़ातिर से या लिहाज़ से मैं मान तो गया

दाग़ देहलवी

कहते हैं जिस को हूर वो इंसाँ तुम्हीं तो हो

दाग़ देहलवी

जो हो सकता है उस से वो किसी से हो नहीं सकता

दाग़ देहलवी

इधर देख लेना उधर देख लेना

दाग़ देहलवी

होश आते ही हसीनों को क़यामत आई

दाग़ देहलवी

ग़म से कहीं नजात मिले चैन पाएँ हम

दाग़ देहलवी

दिल परेशान हुआ जाता है

दाग़ देहलवी

दिल मुब्तला-ए-लज़्ज़त-ए-आज़ार ही रहा

दाग़ देहलवी

बुतान-ए-माहवश उजड़ी हुई मंज़िल में रहते हैं

दाग़ देहलवी

भवें तनती हैं ख़ंजर हाथ में है तन के बैठे हैं

दाग़ देहलवी

भला हो पीर-ए-मुग़ाँ का इधर निगाह मिले

दाग़ देहलवी

बाक़ी जहाँ में क़ैस न फ़रहाद रह गया

दाग़ देहलवी

अजब अपना हाल होता जो विसाल-ए-यार होता

दाग़ देहलवी

अब वो ये कह रहे हैं मिरी मान जाइए

दाग़ देहलवी

आप का ए'तिबार कौन करे

दाग़ देहलवी

लोग जिन को आज तक बार-ए-गराँ समझा किए

डी. राज कँवल

हमारे सब्र का इक इम्तिहान बाक़ी है

चित्रांश खरे

हम जो मिल बैठें तो यक-जान भी हो सकते हैं

चरख़ चिन्योटी

हम जो मिल बैठें तो यक जान भी हो सकते हैं

चरख़ चिन्योटी

लौट चलिए

चन्द्रभान ख़याल

ज़िंदगी की यही कहानी है

चाँदनी पांडे

जहाँ रंग-ओ-बू है और मैं हूँ

चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी

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