जान Poetry (page 47)

जो तुझे इम्तिहान देता है

बेख़ुद देहलवी

झूट सच आप तो इल्ज़ाम दिए जाते हैं

बेख़ुद देहलवी

हज़रत-ए-दिल ये इश्क़ है दर्द से कसमसाए क्यूँ

बेख़ुद देहलवी

हर एक बात तिरी बे-सबात कितनी है

बेख़ुद देहलवी

दिल में फिर वस्ल के अरमान चले आते हैं

बेख़ुद देहलवी

बेवफ़ा कहने से क्या वो बेवफ़ा हो जाएगा

बेख़ुद देहलवी

हैं वस्ल में शोख़ी से पाबंद-ए-हया आँखें

बेखुद बदायुनी

भीतर बसने वाला ख़ुद बाहर की सैर करे मौला ख़ैर करे

बेकल उत्साही

उन को बुत समझा था या उन को ख़ुदा समझा था मैं

बहज़ाद लखनवी

तुझ पर मिरी मोहब्बत क़ुर्बान हो न जाए

बहज़ाद लखनवी

मसरूर भी हूँ ख़ुश भी हूँ लेकिन ख़ुशी नहीं

बहज़ाद लखनवी

क्या ये भी मैं बतला दूँ तू कौन है मैं क्या हूँ

बहज़ाद लखनवी

इक बेवफ़ा को दर्द का दरमाँ बना लिया

बहज़ाद लखनवी

न मेहराब-ए-हरम समझे न जाने ताक़-ए-बुत-ख़ाना

बेदम शाह वारसी

कुछ लगी दिल की बुझा लूँ तो चले जाइएगा

बेदम शाह वारसी

काश मिरी जबीन-ए-शौक़ सज्दों से सरफ़राज़ हो

बेदम शाह वारसी

ग़म्ज़ा पैकान हुआ जाता है

बेदम शाह वारसी

दिल लिया जान ली नहीं जाती

बेदम शाह वारसी

बताए देती है बे-पूछे राज़ सब दिल के

बेदम शाह वारसी

रौनक़ फ़रोग़-ए-दर्द से कुछ अंजुमन में है

बेबाक भोजपुरी

तेग़ चढ़ उस की सान पर आई

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

मत सता मुझ को आन आन अज़ीज़

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

इश्वा है नाज़ है ग़म्ज़ा है अदा है क्या है

बयाँ अहसनुल्लाह ख़ान

ज़ब्त-ए-ग़म कर भी लिया तो क्या किया

बासित भोपाली

हम हथेली पे जान रखते हैं

बशीर महताब

वो सितम-परवर ब-चश्म अश्क-बार आ ही गया

बशीर फ़ारूक़

सबा गुल-ए-रेज़ जाँ-परवर फ़ज़ा है

बशीर फ़ारूक़

तारों भरी पलकों की बरसाई हुई ग़ज़लें

बशीर बद्र

पत्थर के जिगर वालो ग़म में वो रवानी है

बशीर बद्र

बे-तहाशा सी ला-उबाली हँसी

बशीर बद्र

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