जान Poetry (page 46)

फ़ित्ना-ए-रोज़गार की बातें

चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी

देते हैं मेरे जाम में देखें शराब कब

चंद्रभान कैफ़ी देहल्वी

मर्सिया गोपाल कृष्ण गोखले

चकबस्त ब्रिज नारायण

अगर दर्द-ए-मोहब्बत से न इंसाँ आश्ना होता

चकबस्त ब्रिज नारायण

शिकवा नसीब का न करे बार बार तू

बबल्स होरा सबा

पास होने का इशारा मिल गया

बबल्स होरा सबा

तुझ से तसव्वुरात में ऐ जान-ए-आरज़ू

ब्रहमा नन्द जलीस

ग़ैरों ने ग़ैर जान के हम को उठा दिया

बिस्मिल अज़ीमाबादी

सारी उम्मीद रही जाती है

बिस्मिल अज़ीमाबादी

अब रहा क्या है जो अब आए हैं आने वाले

बिस्मिल अज़ीमाबादी

अब दम-ब-ख़ुद हैं नब्ज़ की रफ़्तार देख कर

बिस्मिल अज़ीमाबादी

ये कैसी आग अभी ऐ शम्अ तेरे दिल में बाक़ी है

बिस्मिल इलाहाबादी

कितना अजीब शब का ये मंज़र लगा मुझे

बिस्मिल आग़ाई

आरज़ूएँ नज़्र-ए-दौराँ नज़्र-ए-जानाँ हो गईं

बिर्ज लाल रअना

यूँ न जान अश्क हमें जो गया बाना न मिला

बिमल कृष्ण अश्क

मिरी भी मान मिरा अक्स मत दिखा मुझ को

बिमल कृष्ण अश्क

बस एक जान बची थी छिड़क दी राहों पर

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

बदन पे ज़ख़्म सजाए लहू लबादा किया

बिलक़ीस ज़फ़ीरुल हसन

हमारी ख़ाक तबर्रुक समझ के ले जाओ

बिलाल अहमद

तड़ख़न

बिलाल अहमद

ज़मीं नई थी अनासिर की ख़ू बदलती थी

बिलाल अहमद

गुलाबी गाल पर कुछ रंग मुझ को भी जमाने दो

भारतेंदु हरिश्चंद्र

गले मुझ को लगा लो ऐ मिरे दिलदार होली में

भारतेंदु हरिश्चंद्र

दिल आतिश-ए-हिज्राँ से जलाना नहीं अच्छा

भारतेंदु हरिश्चंद्र

अक़्ल दौड़ाई बहुत कुछ तो गुमाँ तक पहुँचे

बेताब अज़ीमाबादी

ये कह के मेरे सामने टाला रक़ीब को

बेख़ुद देहलवी

दिल हुआ जान हुई उन की भला क्या क़ीमत

बेख़ुद देहलवी

तेशे से कोई काम न फ़रहाद से हुआ

बेख़ुद देहलवी

न क्यूँ-कर नज़्र दिल होता न क्यूँ-कर दम मिरा जाता

बेख़ुद देहलवी

मेरे हम-राह मिरे घर पे भी आफ़त आई

बेख़ुद देहलवी

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