जान Poetry (page 48)

वक़्त के कटहरे में

बशर नवाज़

वहशत में भी रुख़ जानिब-ए-सहरा न करेंगे

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

शम्अ भी इस सफ़ा से जलती है

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

न कोई उन के सिवा और जान-ए-जाँ देखा

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

लाख पर्दे से रुख़-ए-अनवर अयाँ हो जाएगा

मिर्ज़ा रज़ा बर्क़

थे हम इस्तादा तिरे दर पे वले बैठ गए

बक़ा उल्लाह 'बक़ा'

तबाह हो के भी इक अपनी आन बाक़ी है

बाक़र मेहदी

क्या ख़बर थी कि कभी बे-सर-ओ-सामाँ होंगे

बाक़र मेहदी

इस दर्जा हुआ ख़ुश कि डरा दिल से बहुत मैं

बाक़र मेहदी

बहुत ज़ी-फ़हम हैं दुनिया को लेकिन कम समझते हैं!

बाक़र मेहदी

जिस्म अपने फ़ानी हैं जान अपनी फ़ानी है फ़ानी है ये दुनिया भी

बक़ा बलूच

सब्र-ओ-ज़ब्त की जानाँ दास्ताँ तो मैं भी हूँ दास्ताँ तो तुम भी हो

बक़ा बलूच

तर्सील

बलराज कोमल

गिर्या-ए-सगाँ

बलराज कोमल

शमशीर-ए-बरहना माँग ग़ज़ब बालों की महक फिर वैसी ही

ज़फ़र

निबाह बात का उस हीला-गर से कुछ न हुआ

ज़फ़र

नहीं इश्क़ में इस का तो रंज हमें कि क़रार ओ शकेब ज़रा न रहा

ज़फ़र

न दरवेशों का ख़िर्क़ा चाहिए न ताज-ए-शाहाना

ज़फ़र

जिगर के टुकड़े हुए जल के दिल कबाब हुआ

ज़फ़र

हिज्र के हाथ से अब ख़ाक पड़े जीने में

ज़फ़र

गालियाँ तनख़्वाह ठहरी है अगर बट जाएगी

ज़फ़र

गई यक-ब-यक जो हवा पलट नहीं दिल को मेरे क़रार है

ज़फ़र

बाग़-ए-दिल में कोई ग़ुंचा न खिला तेरे बा'द

बदनाम नज़र

फिर किसी शख़्स की याद आई है

बीएस जैन जौहर

मुझे तक़्सीम कर दो

अज़रा अब्बास

फ़ीमेल बुल-फ़ाइटर

अज़रा अब्बास

वतन

अज़मतुल्लाह ख़ाँ

प्यारा प्यारा घर अपना

अज़मतुल्लाह ख़ाँ

नन्हा ग़ासिब

अज़मतुल्लाह ख़ाँ

दरिया पार उतरने वाले ये भी जान नहीं पाए

अज़्म बहज़ाद

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