जान Poetry (page 50)

कोशिशें कर के दिल बुरा किया था

अज़हर फ़राग़

अपने वीराने का नुक़सान नहीं चाहता मैं

अज़हर अब्बास

सहरा का कोई फूल मोअ'त्तर तो नहीं था

अज़ीम कुरेशी

बीच दिलों में उतरा तो है

अज़ीम कुरेशी

वही यकसानियत-ए-शाम-ओ-सहर है कि जो थी

अज़ीम मुर्तज़ा

कुछ और हो भी तो राएगाँ है

अय्यूब ख़ावर

ये बातों ही बातों में बातें बदलना

औरंगज़ेब

निहत्ते आदमी पे बढ़ के ख़ंजर तान लेती है

औरंगज़ेब

अश्क को दरिया बनाया आँख को साहिल किया

औरंगज़ेब

अब कोई और मुसीबत तो न पाली जाए

औरंगज़ेब

तू भी तो एक लफ़्ज़ है इक दिन मिरे बयाँ में आ

अतीक़ुल्लाह

मिरे सुपुर्द कहाँ वो ख़ज़ाना करता था

अतीक़ुल्लाह

जो तकब्बुर से भटकती है ज़बाँ

आतिफ़ ख़ान

जीना है तो जीने का सहारा भी तो होगा

अतहर राज़

यक़ीन बरसों का इम्कान कुछ दिनों का हूँ

अतहर नासिक

गूँगों को ज़बान किस ने दी है

अतहर नासिक

सोचते और जागते साँसों का इक दरिया हूँ मैं

अतहर नफ़ीस

मिस्ल-ए-बाद-ए-सबा तेरे कूचे में ऐ जान-ए-जाँ आए हैं

अतहर नफ़ीस

तुम और मैं

अतीया दाऊद

फिर सदा-ए-मोहब्बत सुनी है अभी

अतीक़ुर्रहमान सफ़ी

दिल लगाना चाहिए चल कर किसी हैवान से

अतीक़ मुज़फ़्फ़रपुरी

अल्फ़ाज़ न दे पाएँ अगर साथ बयाँ का

अतीक़ मुज़फ़्फ़रपुरी

आई है जाने कैसे इलाक़ों से रौशनी

अतीक़ अहमद

वक़्त ने लूटे हैं हस्ती के ख़ज़ाने कितने

अतीब एजाज़

आज भी जिस की ख़ुश्बू से है मतवाली मतवाली रात

अताउर्रहमान जमील

रात वहशत से गुरेज़ाँ था मैं आहू की तरह

अता तुराब

यक लम्हा सही उम्र का अरमान ही रह जाए

अता शाद

चोब-ए-सहरा भी वहाँ रश्क-ए-समर कहलाए

अता शाद

चोब-ए-सहरा भी वहाँ रश्क-ए-समर कहलाए

अता शाद

बड़ा कठिन है रास्ता जो आ सको तो साथ दो

अता शाद

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