जगह Poetry (page 14)

रोना इन का काम है हर दम जल जल कर मर जाना भी

हबीब मूसवी

समय

गुलज़ार

खंडर

गुलज़ार

डाइरी

गुलज़ार

बोसकी

गुलज़ार

वो चराग़-ए-ज़ीस्त बन कर राह में जलता रहा

गुलनार आफ़रीन

क्यूँकर न ख़ुश हो सर मिरा लटक्का के दार में

गोया फ़क़ीर मोहम्मद

ऊँचे दर्जे का सैलाब

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

यूँ तो सदा-ए-ज़ख़्म बड़ी दूर तक गई

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

लब पे सुर्ख़ी की जगह जो मुस्कुराहट मल रहे हैं

ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

वाइ'ज़ ये मय-कदा है न मस्जिद कि इस जगह

ग़ुलाम मौला क़लक़

तेरे वादे का इख़्तिताम नहीं

ग़ुलाम मौला क़लक़

राज़-ए-दिल दोस्त को सुना बैठे

ग़ुलाम मौला क़लक़

दूरी में क्यूँ कि हो न तमन्ना हुज़ूर की

ग़ुलाम मौला क़लक़

ऐ ख़ार ख़ार-ए-हसरत क्या क्या फ़िगार हैं हम

ग़ुलाम मौला क़लक़

पुराने जूते

ग़ुलाम अहमद फ़रीद

कोई दो-चार नहीं महव-ए-तमाशा सब हैं

ग़ुफ़रान अमजद

कोई दो चार नहीं महव-ए-तमाशा सब हैं

ग़ुफ़रान अमजद

किसी के नर्म तख़ातुब पे यूँ लगा मुझ को

ग़ज़नफ़र

मुख़्तसर सी बात को भी मसअला कहते रहे

ग़ौसिया ख़ान सबीन

बेवफ़ा के वा'दे पर ए'तिबार करते हैं

ग़नी एजाज़

रहिए अब ऐसी जगह चल कर जहाँ कोई न हो

ग़ालिब

क्यूँ न फ़िरदौस में दोज़ख़ को मिला लें यारब

ग़ालिब

जब मय-कदा छुटा तो फिर अब क्या जगह की क़ैद

ग़ालिब

तुम जानो तुम को ग़ैर से जो रस्म-ओ-राह हो

ग़ालिब

रहिए अब ऐसी जगह चल कर जहाँ कोई न हो

ग़ालिब

फिर इस अंदाज़ से बहार आई

ग़ालिब

मिलती है ख़ू-ए-यार से नार इल्तिहाब में

ग़ालिब

गर न अंदोह-ए-शब-ए-फ़ुर्क़त बयाँ हो जाएगा

ग़ालिब

सुब्ह हैं सज्दे में हम तो शाम साक़ी के हुज़ूर

गणेश बिहारी तर्ज़

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