शरीर Poetry (page 35)

दाग़ चेहरे का यूँही छोड़ दिया जाता है

अज़हर नवाज़

दिल की गली में चाँद निकलता रहता है

अज़हर इक़बाल

इस लिए मैं ने मुहाफ़िज़ नहीं रक्खे अपने

अज़हर अदीब

कल परदेस में याद आएगी ध्यान में रख

अज़हर अदीब

दर टूटने लगे कभी दीवार गिर पड़े

अज़हर अदीब

सरहद-ए-जिस्म से बाहर कहीं घर लिक्खा था

आज़ाद गुलाटी

सरहद-ए-जिस्म से बाहर कहीं घर लिक्खा था

आज़ाद गुलाटी

मेरा तो नाम रेत के सागर पे नक़्श है

आज़ाद गुलाटी

मैं अपने आप से इक खेल करने वाला हूँ

आज़ाद गुलाटी

हर इक शिकस्त को ऐ काश इस तरह मैं सहूँ

आज़ाद गुलाटी

हमारी आँख में ठहरा हुआ समुंदर था

आज़ाद गुलाटी

डूब कर ख़ुद में कभी यूँ बे-कराँ हो जाऊँगा

आज़ाद गुलाटी

रूह ज़ख़्मी है जिस्म घायल है

आयुष चराग़

आँख की दहलीज़ से उतरा तो सहरा हो गया

अय्यूब ख़ावर

वो

अतीक़ुल्लाह

मैं कि तुम पे बाज़ हूँ

अतीक़ुल्लाह

कितना मुश्किल है

अतीक़ुल्लाह

वो मेरे नाले का शोर ही था शब-ए-सियह की निहायतों में

अतीक़ुल्लाह

क़ल्ब-गह में ज़रा ज़रा सा कुछ

अतीक़ुल्लाह

जब भी तन्हाई के एहसास से घबराता हूँ

अतीक़ुल्लाह

चराग़ हाथों के बुझ रहे हैं सितारा हर रह-गुज़र में रख दे

अतीक़ुल्लाह

वो बात जिस से ये डर था खुली तो जाँ लेगी

आतिफ़ ख़ान

मुसव्विर का हाथ

अतहर राज़

इक आग ग़म-ए-तन्हाई की जो सारे बदन में फैल गई

अतहर नफ़ीस

वो इश्क़ जो हम से रूठ गया अब उस का हाल बताएँ क्या

अतहर नफ़ीस

मिस्ल-ए-बाद-ए-सबा तेरे कूचे में ऐ जान-ए-जाँ आए हैं

अतहर नफ़ीस

दिल तो बरसाता है हर रोज़ ही ग़म के सावन

अतहर अज़ीज़

मोहब्बत की मंज़िल

अतीया दाऊद

आसमाँ गर्दिश में था सारी ज़मीं चक्कर में थी

अतीक़ मुज़फ़्फ़रपुरी

वो सुकून-ए-जिस्म-ओ-जाँ गिर्दाब-ए-जाँ होने को है

अताउल हक़ क़ासमी

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