शरीर Poetry (page 34)

अजीब हालत है जिस्म-ओ-जाँ की हज़ार पहलू बदल रहा हूँ

अज़्म शाकरी

मुझे कल अचानक ख़याल आ गया आसमाँ खो न जाए

अज़्म बहज़ाद

न हाथ सूख के झड़ते हैं जिस्म से अपने

अज़लान शाह

कमाँ न तीर न तलवार अपनी होती है

अज़लान शाह

जहान-ए-फ़िक्र-ओ-नज़र का सबात ले के गया

अज़ीज़ुर्रहमान शहीद फ़तेहपुरी

तसमा-ए-पा

अज़ीज़ तमन्नाई

रसूल-ए-काज़िब

अज़ीज़ क़ैसी

ग़रीब शहर

अज़ीज़ क़ैसी

बाक़ीस्त शब-ए-फ़ित्ना

अज़ीज़ क़ैसी

अज़ल-अबद

अज़ीज़ क़ैसी

आईने से

अज़ीज़ क़ैसी

हयात-ओ-काएनात पर किताब लिख रहे थे हम

अज़ीज़ नबील

फूट निकला ज़हर सारे जिस्म में

अज़ीज़ लखनवी

ताज़ा हवा बहार की दिल का मलाल ले गई

अज़ीज़ हामिद मदनी

हज़ार वक़्त के परतव-नज़र में होते हैं

अज़ीज़ हामिद मदनी

बैठो जी का बोझ उतारें दोनों वक़्त यहीं मिलते हैं

अज़ीज़ हामिद मदनी

टटोलता हुआ कुछ जिस्म ओ जान तक पहुँचा

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

मैं उस के सामने उर्यां लगूँगी दुनिया को

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

मैं अपने जिस्म में रहती हूँ इस तकल्लुफ़ से

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

इस घर के चप्पे चप्पे पर छाप है रहने वाले की

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

ज़रा मुश्किल से समझेंगे हमारे तर्जुमाँ हम को

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

वो इक नज़र से मुझे बे-असास कर देगा

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

टटोलता हुआ कुछ जिस्म ओ जान तक पहुँचा

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

रूठ जाएगा तो मुझ से और क्या ले जाएगा

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

निकलना ख़ुद से मुमकिन है न मुमकिन वापसी मेरी

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

मेरा भी हर अंग था बहरा उस का जिस्म भी गूँगा था

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

लिया है किस क़दर सख़्ती से अपना इम्तिहाँ हम ने

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

लहू से उठ के घटाओं के दिल बरसते हैं

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

अपनी बीती हुई रंगीन जवानी देगा

अज़ीज़ बानो दाराब वफ़ा

हर इक फ़नकार ने जो कुछ भी लिक्खा ख़ूब-तर लिक्खा

अज़ीज अहमद ख़ाँ शफ़क़

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