खाली Poetry (page 17)

एक और शराबी शाम

दर्शिका वसानी

भूक में दबे बचपन

दर्शिका वसानी

जान से हो गए बदन ख़ाली

ख़्वाजा मीर 'दर्द'

हो गया मेहमाँ-सरा-ए-कसरत-ए-मौहूम आह

ख़्वाजा मीर 'दर्द'

मदरसा या दैर था या काबा या बुत-ख़ाना था

ख़्वाजा मीर 'दर्द'

मदरसा या दैर था या काबा या बुत-ख़ाना था

ख़्वाजा मीर 'दर्द'

जग में आ कर इधर उधर देखा

ख़्वाजा मीर 'दर्द'

सितम के बा'द भी बाक़ी करम की आस तो है

दानिश फ़राही

ज़र्रे ज़र्रे में महक प्यार की डाली जाए

दानिश अलीगढ़ी

उन के इक जाँ-निसार हम भी हैं

दाग़ देहलवी

हाथ निकले अपने दोनों काम के

दाग़ देहलवी

देख कर जौबन तिरा किस किस को हैरानी हुई

दाग़ देहलवी

लौट चलिए

चन्द्रभान ख़याल

हुस्न भी कम्बख़्त कब ख़ाली है सोज़-ए-इश्क़ से

बिस्मिल सईदी

नास्टैल्जिया

बिलाल अहमद

नींद आती ही नहीं धड़के की बस आवाज़ से

भारतेंदु हरिश्चंद्र

आ गई सर पर क़ज़ा लो सारा सामाँ रह गया

भारतेंदु हरिश्चंद्र

तुम्हारे हाथ ख़ाली जेब ख़ाली ज़ुल्फ़ ख़ाली थी

बेख़ुद देहलवी

सब्र आता है जुदाई में न ख़्वाब आता है

बेख़ुद देहलवी

न क्यूँ-कर नज़्र दिल होता न क्यूँ-कर दम मिरा जाता

बेख़ुद देहलवी

ख़ुदा रक्खे तुझे मेरी बुराई देखने वाले

बेख़ुद देहलवी

दोनों ही की जानिब से हो गर अहद-ए-वफ़ा हो

बेख़ुद देहलवी

ये दिल जो मुज़्तरिब रहता बहुत है

बेदिल हैदरी

में ग़श में हूँ मुझे इतना नहीं होश

बेदम शाह वारसी

खींची है तसव्वुर में तस्वीर-ए-हम-आग़ोशी

बेदम शाह वारसी

न जाने कब तिरे दिल पर नई सी दस्तक हो

बशीर बद्र

कमरे वीराँ आँगन ख़ाली फिर ये कैसी आवाज़ें

बशीर बद्र

बहुत दिनों से है दिल अपना ख़ाली ख़ाली सा

बशीर बद्र

ज़र्रों में कुनमुनाती हुई काएनात हूँ

बशीर बद्र

कभी तो शाम ढले अपने घर गए होते

बशीर बद्र

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